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जाखल में एफटीए के विरोध में किसानों का प्रदर्शन:राज्यसभा सांसद के भतीजे को सौंपा मांग पत्र, बोले- समझौते से ग्रामीण अर्थव्यवस्था होगी कमजोर




फतेहाबाद के टोहाना में संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के बैनर तले किसानों ने बुधवार को सांसद सुभाष बराला के भतीजे जयदीप बराला को एक ज्ञापन सौंपा। यह ज्ञापन भारत सरकार द्वारा अमेरिका, यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम और न्यूजीलैंड सहित विभिन्न देशों के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के विरोध में दिया गया। किसानों ने इन समझौतों पर पुनर्विचार की मांग की, आशंका जताई कि इनसे छोटे एवं मध्यम किसान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) प्रभावित हो सकते हैं। ज्ञापन में कहा गया है कि विकसित देशों में कृषि क्षेत्र को भारी सब्सिडी मिलती है, जबकि भारतीय किसानों को अपेक्षाकृत कम सहायता प्राप्त होती है। ऐसे में, यदि आयात शुल्क में कमी की जाती है, तो विदेशी कृषि उत्पाद सस्ते दामों पर भारतीय बाजार में पहुंचेंगे। इससे भारतीय किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर कृषि, ग्रामीण रोजगार और स्थानीय उद्योगों पर पड़ेगा। किसान बोले- घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी संयुक्त किसान मोर्चा ने आशंका व्यक्त की कि प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौतों का प्रभाव केवल कृषि तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, बीज, दवा, मशीनरी और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। किसानों का तर्क है कि आयात शुल्क में कमी और विदेशी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी से घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी और एमएसएमई क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ेगा। व्यापार समझौते की सभी वार्ताओं को सार्वजनिक करने की मांग किसानों ने मांग की है कि मुक्त व्यापार समझौतों से संबंधित सभी वार्ताओं को सार्वजनिक किया जाए और अंतिम निर्णय लेने से पहले संसद में विस्तृत चर्चा कराई जाए। उनका कहना है कि किसानों, उपभोक्ताओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक सहमति के बिना ऐसे समझौते नहीं किए जाने चाहिए। संयुक्त किसान मोर्चा ने ज्ञापन के माध्यम से यह चेतावनी भी दी कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वे वर्ष 2020-21 के किसान आंदोलन की तर्ज पर देशव्यापी लोकतांत्रिक आंदोलन शुरू करेंगे। किसानों ने दोहराया कि वे कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हितों की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण ढंग से अपना संघर्ष जारी रखेंगे।



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