हरियाणा मानवाधिकार आयोग (HHRC) ने गुरुग्राम के सोहना में पुलिस हिरासत के दौरान एक आरोपी के साथ कथित मारपीट और उसकी टांग तोड़ने के गंभीर आरोपों पर स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लिया है। हरियाणा के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिए हैं कि जांच आईजीपी (I
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आयोग के चेयरपर्सन जस्टिस ललित बत्रा ने कहा कि यदि न्यायिक आदेश में दर्ज आरोप स्वतंत्र जांच में सही पाए जाते हैं तो यह कस्टोडियल हिंसा, सत्ता के दुरुपयोग और कानून के शासन पर गंभीर हमला माना जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत पूछताछ का कानूनी माध्यम हो सकती है, लेकिन यातना, क्रूरता या अमानवीय व्यवहार का लाइसेंस नहीं।
क्या है पूरा मामला
आयोग ने 30 जून 2026 को सोहना के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) द्वारा पारित आदेश के आधार पर स्वत: संज्ञान लिया। न्यायालय के समक्ष पुलिस ने बताया था कि आरोपी बरामदगी के दौरान भागने की कोशिश में फ्लाईओवर से गिर गया, जिससे उसके पैर में चोट आई और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया।
हालांकि, कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान आरोपी ने दावा किया कि वह फ्लाईओवर से नहीं गिरा, बल्कि पुलिसकर्मियों ने हिरासत में उसकी बाईं टांग जानबूझकर तोड़ दी। उसने अपनी जान को खतरा होने की भी आशंका जताई।
मजिस्ट्रेट ने अस्पताल जाकर दर्ज किए बयान
आरोपों की गंभीरता को देखते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट ने कोर्ट समय समाप्त होने के बाद स्वयं सिविल अस्पताल गुरुग्राम पहुंचकर पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी के बिना आरोपी का बयान दर्ज किया।
आरोपी के अनुसार, उसे 29 जून की शाम CIA थाना सोहना परिसर में खुले स्थान पर ले जाया गया, जहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने उसे चार पर्चियों में से एक चुनने के लिए कहा। पर्चियों पर कथित रूप से “डेथ”, “फ्रैक्चर”, “बुलेट इंजरी” और “रिवॉर्ड मनी” लिखा था।
आरोपी का आरोप है कि उसके हिस्से “LL Fracture” वाली पर्ची आई। इसके बाद उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर पैर को दो ईंटों के बीच रखकर किसी भारी वस्तु से वार किया गया, जिससे उसकी टांग टूट गई। बाद में उसे अस्पताल ले जाकर डॉक्टरों के सामने फ्लाईओवर से गिरने की कहानी बताने का दबाव बनाया गया और सच बताने पर जान से मारने की धमकी दी गई।
आयोग ने संविधान और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
आयोग ने कहा कि किसी व्यक्ति पर अपराध का आरोप लगने मात्र से उसके संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। हर व्यक्ति को अनुच्छेद 14, 20(3), 21 और 22 के तहत जीवन, गरिमा और निष्पक्ष प्रक्रिया का अधिकार प्राप्त है।
आयोग ने UDHR, ICCPR और नेल्सन मंडेला नियमों का भी उल्लेख किया। साथ ही डी.के. बसु, नीलाबती बेहरा, जोगिंदर कुमार और परमवीर सिंह सैनी मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस स्टेशनों में CCTV की स्थापना और संरक्षण जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है।
