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लीगल एड डिफेंस काउंसिल (एलएडीसी) नीति के विरोध में जिला बार एसोसिएशन, करनाल ने मंगलवार को एक बार फिर ‘नो वर्क डे’ मनाया। करनाल से शुरू हुए इस विरोध के तहत अधिवक्ताओं ने न्यायालयों में कामकाज पूरी तरह से ठप रखा और सरकार के फैसले के खिलाफ एकजुटता दिखाई। संयुक्त बार एसोसिएशनों की संयुक्त कार्रवाई समिति के आह्वान पर यह कदम उठाया गया। हड़ताल के चलते जिला न्यायालय परिसर में दिनभर सन्नाटा पसरा रहा, जिससे आम लोगों के मामलों की सुनवाई भी प्रभावित हुई। बार एसोसिएशन ने साफ कर दिया कि ‘नो वर्क डे’ के दौरान कोई भी सदस्य, प्रॉक्सी काउंसल को छोड़कर, किसी भी रूप में अदालत में पेश नहीं होगा। यदि कोई अधिवक्ता इस निर्णय का उल्लंघन करता है तो उस पर ₹5,000 का जुर्माना लगाया जाएगा। इस सख्त निर्देश के कारण अधिकांश वकील हड़ताल में शामिल रहे और अदालतों में नियमित कार्य पूरी तरह बाधित रहा। पहले जानिए एलएडीसी नीति क्या है और कैसे करती है काम
एलएडीसी (लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम) भारत सरकार की एक योजना है, जिसे नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) द्वारा लागू किया गया है। इसका उद्देश्य गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को खासकर फौजदारी मामलों में मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराना है। इस योजना के तहत सरकार फुल-टाइम वकीलों की नियुक्ति करती है, जिन्हें नियमित सैलरी दी जाती है। ये वकील केवल उन आरोपियों के केस लड़ते हैं जो वकील की फीस देने में सक्षम नहीं होते। हर जिले में एक टीम बनाई जाती है, जिसमें चीफ लीगल एड डिफेंस काउंसिल, डिप्टी काउंसिल, असिस्टेंट काउंसिल और सपोर्ट स्टाफ शामिल होता है। वर्ष 2023-24 से यह व्यवस्था देशभर में लागू की जा रही है और कई जिलों में इसके कार्यालय शुरू हो चुके हैं। पहले क्या थी नीति
पहले लीगल एड के तहत पैनल वकीलों का चयन रोटेशन सिस्टम के आधार पर तीन साल के लिए किया जाता था, जिससे नए और युवा अधिवक्ताओं को भी काम करने का अवसर मिलता था। अब इस व्यवस्था के खत्म होने से काम कुछ चुनिंदा वकीलों तक सीमित हो गया है, जिससे नए वकीलों को न तो पर्याप्त केस मिल रहे हैं और न ही उनका अनुभव बढ़ पा रहा है। सरकारी नियंत्रण से निष्पक्षता पर सवाल
अधिवक्ता राजकुमार व अधिवक्ता आदित्य मंगलौर ने कहा कि एलएडीसी सिस्टम में सरकार द्वारा चीफ डिफेंस काउंसिल की नियुक्ति किए जाने से पूरी व्यवस्था सरकारी नियंत्रण में आ सकती है। उनका कहना है कि जब अभियोजन पक्ष पहले से ही सरकार का होता है और डिफेंस काउंसिल को भी सरकार वेतन देती है, तो ऐसे में निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है। उन्होंने यह भी बताया कि एक डिफेंस काउंसिल के पास करीब हजारों केस हो सकते हैं, जिससे हर मामले को पर्याप्त समय देना संभव नहीं रहेगा। सरकार के दावे
सरकार का कहना है कि इस सिस्टम से गरीबों को बेहतर और नियमित कानूनी सहायता मिलेगी, केस की गुणवत्ता सुधरेगी और अंडरट्रायल कैदियों को जल्दी न्याय मिल सकेगा। पहले पैनल वकीलों को कम फीस मिलने के कारण काम की गुणवत्ता प्रभावित होती थी, जिसे अब सुधारा जा सकेगा। वकीलों की आपत्ति
वहीं दूसरी ओर वकीलों का कहना है कि यह व्यवस्था एक ‘क्लोज्ड सिस्टम’ बनती जा रही है, जिसमें केवल सीमित वकीलों को ही अवसर मिल रहा है। उनका आरोप है कि पूरे जिले में 4 से 5 वकीलों को ही हजारों केस सौंप दिए जाते हैं, जिससे केस का बोझ बढ़ता है और न्याय की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। वकीलों की मांग है कि जो सिस्टम पहले चल रहा था, उसको वैसे ही रहने दिया जाए, ताकि रोटेशन सिस्टम बना रहे और अन्य वकीलों को काम मिलता रहे। आंदोलन तेज करने के संकेत
बार एसोसिएशन ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल एक दिन के लिए ‘नो वर्क’ किया गया है, लेकिन यदि सरकार ने इस नीति पर पुनर्विचार नहीं किया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। अधिवक्ताओं का कहना है कि वे अपनी मेहनत के आधार पर स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करना चाहते हैं और उनके अधिकारों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी। बार एसोसिएशन के अनुसार यह आंदोलन केवल वकीलों के हित तक सीमित नहीं है, बल्कि न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए भी जरूरी है।
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एलएडीसी नीति के विरोध में करनाल बार का ‘नो वर्क:अदालतों में कामकाज ठप,युवा वकीलों के भविष्य पर खतरे का आरोप,नियम तोड़ने पर ₹5,000 जुर्माने की चेतावनी







