हरियाणा सरकार के चर्चित सरकारी फंड घोटाले में गिरफ्तार IAS अधिकारी एवं हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (HSPCB) के पूर्व सदस्य सचिव प्रदीप कुमार को रिमांड के बाद फिर से कोर्ट में पेश करेगी, जो 2 दिन से रिमांड पर चल रहे थे। CBI ने दावा किया है कि
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CBI का दावा: निवेश की पूरी प्रक्रिया में थी सक्रिय भूमिका
CBI के अनुसार, प्रदीप कुमार 31 अगस्त 2022 से 10 दिसंबर 2025 तक HSPCB में सदस्य सचिव रहे। इसी दौरान बोर्ड के फिक्स्ड डिपॉजिट निवेश से जुड़े निर्णयों में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई। सीबीआई के अनुसार, उन्होंने विभिन्न बैंकों से प्राप्त एफडी कोटेशन का तुलनात्मक विश्लेषण स्वयं तैयार किया और निवेश संबंधी प्रस्ताव दिए।
जांच एजेंसी का आरोप है कि उन्होंने निवेश सीमा तय करने वाले सरकारी दिशा-निर्देशों का उल्लेख तो अपनी नोटशीट में किया, लेकिन व्यवहार में उन्हीं सीमाओं का लगातार उल्लंघन करते हुए बड़ी राशि IDFC फर्स्ट बैंक में निवेश कराई।
IAS प्रदीप डागर। फाइल फोटो
अब जानिए घोटाले में IAS प्रदीप डागर की भूमिका…
बैंक को बाहर रखने के बावजूद स्वीकार किए कोटेशन: सीबीआई ने आवेदन में आरोप लगाया कि IDFC फर्स्ट बैंक को निवेश प्रक्रिया से बाहर रखने का निर्णय होने के बावजूद उसी बैंक के कोटेशन स्वीकार किए गए। इतना ही नहीं, बैंक द्वारा भेजे गए जिस कोटेशन पर न बैंक की मुहर थी, न शाखा का नाम और न ही हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी का विवरण, उसे भी मान्य माना गया। जांच एजेंसी का कहना है कि प्रतियोगी बैंकों के कोटेशन की तुलना में भी हेरफेर कर IDFC फर्स्ट बैंक को लाभ पहुंचाया गया।
बचत खाते में भी जमा कराए 8 करोड़: IAS प्रदीप डागर ने बिना किसी प्रतिस्पर्धी कोटेशन के केवल अधिक ब्याज दर की धारणा के आधार पर IDFC फर्स्ट बैंक के बचत खाते में 8 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि जमा कराई गई। सीबीआई ने इसे पक्षपातपूर्ण निर्णय का उदाहरण बताया है।
‘पूरी साजिश का हिस्सा थे प्रदीप कुमार’: सीबीआई का दावा है कि यह कोई प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि सुनियोजित और लगातार अपनाई गई रणनीति थी, जिसके जरिए सरकारी धन के दुरुपयोग और गबन को अंजाम दिया गया। एजेंसी के अनुसार, प्रदीप कुमार की भूमिका अन्य आरोपियों के साथ मिलकर किए गए षड्यंत्र का हिस्सा रही।
CBI का आरोप: जांच से बचते रहे, मोबाइल भी बंद रखा: रिमांड आवेदन के मुताबिक प्रदीप कुमार 24 जून को जांच में शामिल हुए थे, लेकिन उसके बाद उनसे संपर्क नहीं हो सका। 25 जून को उनका मोबाइल फोन बंद मिला। परिवार से पूछताछ के दौरान भी उनका ठिकाना नहीं बताया गया। सीबीआई का कहना है कि तकनीकी निगरानी, कॉल डिटेल और लोकेशन ट्रैकिंग के जरिए उनकी तलाश की गई और अंततः 30 जून को नरवाना टोल प्लाजा से हिरासत में लिया गया।
जांच अभी जारी, बड़े अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
सीबीआई ने अदालत को बताया कि यह मामला बड़े स्तर पर सरकारी धन के कथित दुरुपयोग से जुड़ा है। विभिन्न विभागों के बैंक खातों में हुई अनधिकृत वित्तीय गतिविधियों की जांच जारी है और अन्य वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। एजेंसी का कहना है कि सरकारी धन के पूरे ट्रेल और सभी लाभार्थियों की पहचान की जा रही है।
