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अखिल भारतीय साहित्य परिषद पंचकूला इकाई की मासिक संगोष्ठी और कबीर जयंती महोत्सव का आयोजन शनिवार को प्रेस क्लब सेक्टर-27 में हुआ। साहित्यकार डॉ. संतोष गर्ग की अध्यक्षता में हुए इस कार्यक्रम में संत कबीर को उनकी साखी, दोहे व भजनों के माध्यम से याद किया गया। शुरुआत सृजन संस्था के अध्यक्ष प्रसिद्ध गायक सोमेश गुप्त ने सरस्वती वंदना से की। मुख्य अतिथि संवाद साहित्य मंच के अध्यक्ष साहित्यकार प्रेम विज, विशिष्ठ अतिथि के रूप में श्रीकांत व राष्ट्रीय कवि संगम के संरक्षक रमेश मित्तल शामिल हुए। मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ कवयित्री डॉ. सुनीता नैन पहुंचीं। हरिंदर सिन्हा ने कबीर जी के दोहे- बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर आदि, संतोष गर्ग ने- साईं इतना दीजिए यामे कुटुंब समाए। मैं भी भूखा न रहूं, साधू न भूखा जाए, प्रेम विज ने- पत्थर पर पूजे हरी मिले, तो मैं पूजूं पहाड़, अनिल चिंतक ने कल करे सो आज, आज करे सो अब। पल- पल में प्रलय होगी, बहुरि करेगा कब, दोहे सुनाए। अनिल शर्मा चिंतक ने संत कबीर की जीवनी सुनाई। केदार अदवी ट्रस्ट के अध्यक्ष गणेश दत्त, पूर्व ज्वाइंट रजिस्ट्रार हाईकोर्ट कृष्णा गोयल, एमएल अरोड़ा, रा. कवि संगम मोहाली इकाई के अध्यक्ष रंजन मगौत्रा, कवयित्री सीमा शर्मा, हरेन्दर सिन्हा, आशा रानी व अन्य कवियों ने भी अपने कविताओं के माध्यम से संत कबीर के उपदेशों को प्रस्तुत किया। इस दौरान आरडी कैले, अवतार सिंह व राहुल चौहान भी मौजूद रहे। डिग्रियां सब बटोर ली, पढ़ा न मन का कोर डॉ. विनोद कुमार शर्मा ने संत कबीर को धीर-गंभीर स्वभाव व जागरण युग के अग्रदूत शब्दों से संबोधित किया। कृष्णा गोयल ने कहा- धनवान की झूठ में हां जी- हां जी होए, सोमेश गुप्ता ने- बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय, पेश किया। आशा रानी ने कहा- इस बात पर हमें भी विचार करना होगा कि डिग्रियां सब बटोर ली, पढ़ा न मन का कोर, सुनीता नैन बोलीं- रे मन मूर्ख जन्म गंवायो, श्याम शरण नहीं आयो, कबीर सरल सहज भाषा में अपने मन की बात कहते थे। रंजन मगोत्रा ने कहा- विश्वास के सहारे नैया चलती है। मोह, पीड़ा को हर कोई सहता निर्धन हो या धनवान, सीमा शर्मा ने- आदमी अपने घरों में खुद किरायेदार है, सुनाया। गणेश दत्त ने हमें जहां कहीं भी कोई गुण मिले, उसे ग्रहण कर लेना चाहिए सुनाया।
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संत कबीर को उनके साखी, दोहे और भजनों के जरिए याद किया







