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2002 Remission Policy For Easier Prisoner Release


चंडीगढ़4 मिनट पहले

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हरियाणा सरकार की कैदियों की समयपूर्व रिहाई (रिमिशन) नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-161 के तहत राज्यपाल की ओर से बनाई गई 2002 की माफी (रिमिशन) नीति, बाद में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत बनाई गई 2008 की नीति पर हावी रहेगी।

यानी राज्य सरकार वैधानिक नीति बनाकर राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति को निष्प्रभावी नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि अनुच्छेद-161 के तहत राज्यपाल की शक्ति स्वतंत्र और संवैधानिक है। इसे किसी वैधानिक नीति से खत्म या कमजोर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने क्या कहा? सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, राज्यपाल की 2002 की रिमिशन नीति प्रभावी रहेगी। 2008 की नीति 2002 की नीति को निरस्त नहीं कर सकती। अनुच्छेद-161 के तहत मिली संवैधानिक शक्ति अलग और सर्वोच्च है। हालांकि यह फैसला भविष्य के मामलों पर लागू होगा, पहले से निपटाए गए मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा।

किस मामले में आया फैसला? यह फैसला परवीन कुमार उर्फ परवीन चौहान की याचिका पर आया। चौहान ने 14 साल की सजा पूरी करने के बाद 2002 की नीति के तहत समयपूर्व रिहाई की मांग की थी। लेकिन हरियाणा सरकार ने उनका मामला 2008 की नीति के तहत मानते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील स्वीकार करते हुए हरियाणा सरकार को चार सप्ताह के भीतर उनकी रिहाई संबंधी आवेदन पर नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया।

मामला क्या है? 2009 में 12 वर्षीय बच्चे की हत्या के मामले में परवीन चौहान दोषी ठहराए गए थे। उन्हें हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा मिली थी। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखी। 2022 में उन्होंने 2002 की नीति के आधार पर समयपूर्व रिहाई की मांग की, जिसे सरकार ने 2008 की नीति का हवाला देकर खारिज कर दिया था। इस फैसले का सबसे बड़ा असर

हरियाणा में आजीवन कारावास की सजा काट रहे उन कैदियों पर पड़ेगा, जिन्होंने 12 अप्रैल 2002 की राज्यपाल द्वारा मंजूर रिमिशन (समयपूर्व रिहाई) नीति के तहत रिहाई की मांग की है।

2002 की नीति का लाभ मिल सकता है: जिन कैदियों का मामला 2002 की नीति के दायरे में आता है, उनके आवेदन अब 2008 की सख्त नीति के बजाय 2002 की नीति के अनुसार तय किए जा सकते हैं। राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति को मजबूती: सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि संविधान के अनुच्छेद-161 के तहत राज्यपाल की माफी/रिमिशन देने की शक्ति सर्वोपरि है। राज्य सरकार CrPC के तहत नई नीति बनाकर इसे खत्म या कमजोर नहीं कर सकती।

भविष्य के मामलों पर लागू होगा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला भविष्य में आने वाले मामलों पर लागू होगा। पहले जिन कैदियों के आवेदन का अंतिम निपटारा हो चुका है, उनके मामले दोबारा नहीं खोले जाएंगे।

हरियाणा सरकार को नीति लागू करने का तरीका बदलना होगा: अब सरकार को ऐसे मामलों में राज्यपाल की 2002 की नीति को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने होंगे। यह फैसला उन राज्यों में भी कानूनी मिसाल बनेगा, जहां राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों और सरकार की रिमिशन नीति के बीच विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है।

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