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हाईकोर्ट से नर्सिंग होम संचालक की अग्रिम जमानत याचिका खारिज:उकलाना का आयुष्मान क्लेम घोटाला, HC ने कहा- हिरासत में लेकर पूछताछ जरुरी




आयुष्मान भारत योजना में कथित फर्जी क्लेम और जाली दस्तावेज तैयार करने के मामले में उकलाना स्थित विधाता नर्सिंग होम के संचालक डॉ. बिजेंद्र टाक को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि मामले की निष्पक्ष और प्रभावी जांच के लिए आरोपी से पुलिस हिरासत में पूछताछ (कस्टोडियल इंटरोगेशन) आवश्यक है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध रिकॉर्ड से यह प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता ने ऐसे मरीजों के फर्जी बिल तैयार किए, जो संबंधित अवधि के दौरान अस्पताल में भर्ती ही नहीं थे। इन कथित फर्जी बिलों का उपयोग आयुष्मान भारत योजना के पोर्टल पर क्लेम करने के लिए किया जाना था। अदालत ने माना कि पुलिस को यह पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता है कि क्या इसी प्रकार की कार्यप्रणाली अपनाकर अन्य मामलों में भी योजना का दुरुपयोग किया गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल अग्रिम जमानत याचिका के निस्तारण तक सीमित हैं। ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों के आधार पर मामले का स्वतंत्र रूप से निर्णय करेगा और इस आदेश से प्रभावित नहीं होगा। जिला अदालत भी पहले कर चुकी थी याचिका खारिज गौरतलब है कि थाना उकलाना में सीएम फ्लाइंग हिसार रेंज इंचार्ज सुनैना के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की टीम के साथ रेड 22 मार्च 2026 को विधाता नर्सिंग होम पर रेड की थी और टीम की शिकायत पर डॉ. बिजेंद्र टाक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318(4), 336(3), 338 और 340 के तहत मामला दर्ज किया गया था। गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने पहले हिसार की जिला एवं सत्र अदालत में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मामले की जांच गंभीर प्रकृति की है और प्रभावी जांच के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ आवश्यक है। संयुक्त टीम की जांच में सामने आई थीं अनियमितताएं पुलिस के अनुसार, 22 मार्च 2026 को सीएम फ्लाइंग हिसार रेंज इंचार्ज सुनैना ने स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम के साथ विधाता नर्सिंग होम में छापेमारी की थी। जांच के दौरान आयुष्मान भारत पोर्टल पर कुछ मरीजों को भर्ती दिखाया गया, जबकि वे अस्पताल में मौजूद नहीं पाए गए। जांच में एक नवजात शिशु के रिकॉर्ड में डिस्चार्ज तिथि सहित अन्य विवरणों में कटिंग मिलने का भी दावा किया गया। बच्चे के पिता संदीप ने बयान देकर कहा कि उसका बच्चा दोबारा अस्पताल में भर्ती नहीं हुआ था, जबकि पोर्टल पर उसे भर्ती दर्शाकर करीब 48 हजार रुपए का क्लेम किया गया। पुलिस के अनुसार, रिकॉर्ड में कथित रूप से फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेज भी मिले। इसके अलावा जिस चिकित्सक के नाम पर इलाज दर्शाया गया था, उन्होंने भी अस्पताल आने तथा रिकॉर्ड पर हस्ताक्षर और सील करने से इनकार किया। बचाव पक्ष ने लगाए थे झूठा फंसाने के आरोप बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी थी कि डॉ. बिजेंद्र टाक को झूठा फंसाया गया है। सभी बिल उपचार के अनुरूप आयुष्मान पोर्टल पर अपलोड किए गए थे तथा मामला पूरी तरह दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित है। चूंकि सभी दस्तावेज पहले से पुलिस के कब्जे में हैं, इसलिए हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है। वहीं राज्य पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी मामले का मुख्य व्यक्ति है और आयुष्मान पोर्टल के माध्यम से कथित फर्जी क्लेम किए गए हैं। निष्पक्ष जांच तथा पूरे नेटवर्क का पता लगाने के लिए आरोपी से पुलिस हिरासत में पूछताछ जरूरी है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पहले जिला अदालत और अब पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद डॉ. बिजेंद्र टाक को बड़ा कानूनी झटका माना जा रहा है।



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