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पंजाब की धरती ने कई ऐसे होनहारों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी मेहनत और काबिलियत से देश भर में राज्य का नाम रोशन किया है। आज हम आपको पंजाब के एक ऐसे ही समर्पित और होनहार डॉक्टर की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्हें लोग प्यार और सम्मान से लिवर गुरु के नाम से जानते हैं। हम बात कर रहे हैं देश के सबसे युवा लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन, डॉ. गुरसागर सिंह सहोता की। अपनी अद्भुत मेडिकल स्किल्स और सेवा भाव से डॉ. सहोता न सिर्फ जटिल ऑपरेशनों को अंजाम दे रहे हैं, बल्कि ‘ऑर्गन डोनेशन’ (अंगदान) जैमहा-मुहिम के जरिए समाज में एक नई चेतना भी जगा रहे हैं। सरकारी स्कूल के छात्र से AIIMS के गोल्ड मेडलिस्ट बनने तक का प्रेरणादायक सफर मूल रूप से आनंदपुर साहिब के रहने वाले डॉ. सहोता की सफलता की कहानी हर युवा के लिए एक मिसाल है। उनके माता-पिता पेशे से शिक्षक हैं, जिन्होंने बचपन से ही उनमें अनुशासन और शिक्षा के प्रति लगन के बीज बोए। शुरुआती पढ़ाई: डॉ. सहोता की प्रारंभिक शिक्षा नंगल मॉडल सरकारी स्कूल से हुई। मेडिकल की नींव:इसके बाद उन्होंने लुधियाना के प्रतिष्ठित डीएमसी (DMC) अस्पताल से अपनी एमबीबीएस (MBBS) की पढ़ाई पूरी की। सर्जरी में विशेषज्ञता: सर्जरी के क्षेत्र में गहरी रुचि होने के कारण, उन्होंने लखनऊ के केजीएमसी (KGMC) से सर्जरी की बारीकियां सीखीं। एम्स (AIIMS) में स्वर्णिम कामयाबी: उनकी जिंदगी का सबसे चुनौतीपूर्ण पड़ाव एम्स का कठिन एंट्रेंस एग्जाम क्रैक करना था। इसके लिए उन्होंने रोजाना 15 से 16 घंटे तक कड़ी मेहनत की। उनकी यह तपस्या रंग लाई और 2016 में उन्होंने पूरे भारत में दूसरी रैंक (Rank 2) हासिल करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया। यहीं से उनके पेट और लिवर ट्रांसप्लांट की उच्च स्तरीय विशेषज्ञता का सफर शुरू हुआ। पंजाब का पहला आत्मनिर्भर ट्रांसप्लांट: राज्य के लिए गर्व का क्षण एम्स से निकलने के बाद, डॉ. सहोता ने 2021 से मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित एक निजी अस्पताल में करीब साढ़े तीन साल तक अपनी शानदार सेवाएं दीं। लेकिन उन्होंने अपने गृह राज्य पंजाब के लिए कुछ बड़ा करने की ठानी थी।
साल 2024 में उन्होंने लुधियाना के डीएमसी (DMC) में पंजाब का **पहला ऐसा लिवर ट्रांसप्लांट** किया, जिसमें बाहर से किसी भी विशेषज्ञ डॉक्टर को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ी।
इससे पहले राज्य में ऐसे जटिल और संवेदनशील ऑपरेशनों के लिए बाहरी सर्जनों पर निर्भर रहना पड़ता था। डॉ. सहोता की इस उपलब्धि ने पंजाब के मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को एक नई मजबूती दी। चुनौतीपूर्ण केस: 3 साल के मासूम से लेकर 69 साल के बुजुर्ग तक को दी नई जिंदगी दी है। डॉ. सहोता अब तक 550 से ज्यादा सफल लिवर ट्रांसप्लांट कर चुके हैं। उनके करियर में कई ऐसे जटिल केस आए, जहां उम्मीद न के बराबर थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी: सबसे कम उम्र का मरीज:2023 में उनके पास एक 3 साल का मासूम बच्चा आया, जो जन्म से ही फैटी लिवर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा था। स्थिति बेहद नाजुक थी, लेकिन बच्चे के पिता ने अपने लिवर का एक हिस्सा दान किया और डॉ. सहोता ने अपनी सर्जिकल विशेषज्ञता से उस मासूम की जान बचा ली। सबसे बुजुर्ग मरीज: इसके अलावा, उन्होंने 69 साल के एक बुजुर्ग का भी सफल ट्रांसप्लांट किया है, जो मेडिकल जगत में अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड माना जाता है। लिवर गुरु’ की पहचान और ऑर्गन डोनेशन (अंगदान) की महा-मुहिम डॉ. सहोता का मानना है कि एक सफल सर्जन होने के साथ-साथ समाज को जागरूक करना भी उनकी जिम्मेदारी है। 2021 में उन्होंने लोगों को लिवर की बीमारियों के प्रति जागरूक करने के लिए सोशल मीडिया पर एक व्यापक अभियान शुरू किया, जिसके बाद जनता ने उन्हें लिवर गुरु’ का नाम दिया अंगदान के लिए कर रहे हैं प्रेरित: भारत में आज भी अंगों की कमी के कारण हर साल हजारों मरीजों की जान चली जाती है। इस कमी को दूर करने और लोगों के मन से अंगदान का डर खत्म करने के लिए डॉ. सहोता ‘अजूनी लाइफ लाइन वेलफेयर सोसाइटी’ के बैनर तले एक विशेष मुहिम चला रहे हैं। वह लगातार सेमिनार, सोशल मीडिया और कैंप्स के जरिए लोगों को समझा रहे हैं कि अंगदान महादान है, जिससे किसी मरने वाले इंसान को फिर से जिंदगी दी जा सकती है। परिवार का भी मिल रहा पूरा साथ डॉ. सहोता की इस पूरी यात्रा में उनका परिवार उनके लिए एक मजबूत स्तंभ रहा है। उनकी पत्नी एक रिसर्च फार्मासिस्ट हैं, जो मेडिकल फील्ड से होने के कारण उनके काम की गहराई को समझती हैं और उनका पूरा सहयोग करती हैं। उनका एक बेटा भी है।
अपने परिवार के समर्थन और अपनी आधुनिक सर्जिकल तकनीक के दम पर, डॉ. गुरसागर सिंह सहोता मेडिकल साइंस और समाज सेवा में लगातार नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।
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पंजाब-'लिवर गुरु' ने 500 मरीजों को दी नई जिंदगी:2024 में DMC में किया पहला लिवर ट्रांसप्लांट; अंगदान की चला रहे मुहिम







