Related Posts

पंजाब-डिजिटल मोड पर नशे का कारोबार, क्रिप्टोकरेंसी से पेमेंट:केंद्रीय गृह राज्य मंत्री का खुलासा; वॉट्सएप, टेलीग्राम और जैंगी एप्स से ड्रग्स की डील




पंजाब में सीमा पार से चल रहा नशीले पदार्थों की तस्करी का कारोबार अब पूरी तरह हाईटेक हो गया है। तस्करी और पैसों के लेन-देन का सारा काम डिजिटल मोड यानी वॉट्सएप, टेलीग्राम, स्पचैट और जैंगी जैसे एन्क्रिप्टेड ऐप्स से चल रहा है, जबकि पेमेंट के लिए अब क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल हो रहा है। वहीं, जेल में बैठे तस्करों का ड्रग नेटवर्क ‘रिमोट कंट्रोल’ की तरह बिना रुके चलता रहता है। यह जानकारी केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने दी है। साथ ही, इन हाईटेक अपराधियों से निपटने के लिए अधिकारियों को अमेरिका की यूएस-डीईए (यूएस ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन) और राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (आरआरयू) के सहयोग से प्रशिक्षण भी दिलाया जा रहा है। अब 5 प्वाइंटों में जानिए नशे के काले कारोबार को 1. सोशल मीडिया और एप्स से चल रही पूरी सप्लाई चेन
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) और पंजाब एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स की जांच में सामने आया कि अब ड्रग तस्कर सीधे फोन कॉल या सामान्य संदेश का इस्तेमाल नहीं करते। वे टेलीग्राम समेत एन्क्रिप्टेड सोशल मीडिया ऐप्स पर लाइव लोकेशन शेयर कर बताते हैं कि खेप कहां और किस समय उठानी है। माल डिलीवरी प्वाइंट पर पहुंचने के बाद उसकी फोटो और छोटे वीडियो भेजकर पुष्टि की जाती है। इससे बिना ज्यादा बातचीत किए पूरी सप्लाई चेन संचालित होती है और एजेंसियों के लिए सबूत जुटाना मुश्किल हो जाता है। 2. सोशल मीडिया से युवाओं की भर्ती, आसान पैसे का लालच
ड्रग्स की सप्लाई करने वाले ‘कैरियर’ (डिलीवरी बॉय) की भर्ती के लिए टेलीग्राम चैनलों और गुप्त ग्रुपों का इस्तेमाल किया जा रहा है। स्थानीय युवाओं को कम समय में ज्यादा कमाई का लालच देकर इस नेटवर्क से जोड़ा जाता है। भर्ती होने के बाद उन्हें केवल एक जगह से दूसरी जगह ड्रग्स पहुंचाने का काम दिया जाता है, ताकि वे पूरे नेटवर्क की जानकारी से अनजान रहें और पकड़े जाने पर भी बड़े तस्करों तक पहुंचना मुश्किल हो। 3. क्रिप्टोकरेंसी से हो रहा करोड़ों का लेनदेन
पारंपरिक हवाला और बैंक ट्रांसफर में लेन-देन का रिकॉर्ड (पेपर ट्रेल) रह जाता है, जिसे जांच एजेंसियां ट्रैक कर सकती हैं। इससे बचने के लिए ड्रग माफिया वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (वीडीए) और क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल कर रहा है। जांच में सामने आया कि प्राइवेसी-ओरिएंटेड क्रिप्टो कॉइन्स और विदेश आधारित क्रिप्टो एक्सचेंजों के जरिए ड्रग मनी भेजी और प्राप्त की जा रही है। चूंकि कई विदेशी एक्सचेंज भारतीय एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं और सख्त केवाईसी (नो योर कस्टमर) नियमों का पालन नहीं करते, इसलिए भेजने और पाने वाले की पहचान छिपाना आसान हो जाता है। 4. वीपीएन और डार्कनेट बना तस्करों का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच
तस्कर अपनी असली पहचान और लोकेशन छिपाने के लिए वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) का इस्तेमाल करते हैं। वीपीएन की मदद से उनका इंटरनेट किसी दूसरे देश से चलता हुआ दिखाई देता है, जिससे उनकी वास्तविक आईपी लोकेशन छिप जाती है। वहीं, बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थों की खरीद-फरोख्त डार्कनेट पर की जा रही है। डार्कनेट इंटरनेट का ऐसा हिस्सा है, जहां सामान्य ब्राउजर से पहुंचना संभव नहीं होता और इसे ट्रैक करना बेहद जटिल होता है। यहां सौदा तय होने के बाद ड्रग्स की सप्लाई कूरियर या अन्य गुप्त तरीकों से की जाती है। 5. जेल से ‘रिमोट कंट्रोल’ की तरह चल रहा ड्रग सिंडिकेट
जांच में सबसे गंभीर खुलासा यह हुआ कि जेल में बंद कई कुख्यात तस्कर भी नेटवर्क का संचालन कर रहे हैं। वे जेल में अवैध रूप से मोबाइल फोन हासिल कर बाहर मौजूद अपने गुर्गों और विदेशी तस्करों से लगातार संपर्क बनाए रखते हैं। जेल में बैठा सरगना सीमा पार से आने वाली खेप, उसकी डिलीवरी, नए कैरियर की भर्ती, पैसों के लेन-देन के तरीके (क्रिप्टो या हवाला) और पूरे नेटवर्क की रणनीति तय करता है। यानी सलाखों के पीछे होने के बावजूद उनका ड्रग सिंडिकेट ‘रिमोट कंट्रोल’ की तरह बिना रुके काम करता रहता है। इन 4 प्वाइंटों से अपराधियों पर से निपटने की स्ट्रेटजी 1. अमेरिका की यूएस-डीईए से हाईटेक ट्रेनिंग
ड्रग तस्करों के बदलते तौर-तरीकों से निपटने के लिए भारतीय अधिकारियों को अमेरिका की यूएस-डीईए (यूएस ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन) और राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (आरआरयू) के सहयोग से विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें टेक आधारित ड्रग्स जांच, डिजिटल फॉरेंसिक, डार्कनेट मॉनिटरिंग, क्रिप्टोकरेंसी ट्रैकिंग और साइबर जांच की आधुनिक तकनीकें सिखाई जा रही हैं, ताकि हाईटेक ड्रग सिंडिकेट पर प्रभावी कार्रवाई की जा सके। 2. डार्कनेट और क्रिप्टो पर स्पेशल टास्क फोर्स
मल्टी एजेंसी सेंटर (एमएसी) के तहत डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े मामलों की निगरानी के लिए विशेष टास्क फोर्स बनाई है। यह टीम विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच रीयल-टाइम इंटेलिजेंस साझा कर ड्रग नेटवर्क का पता लगाने और उसे तोड़ने का काम कर रही है। 3. एनसीबी ने तैनात किए साइबर एक्सपर्ट्स
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने डार्कनेट, वीपीएन, एन्क्रिप्टेड ऐप्स और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए चल रहे ड्रग कारोबार की जांच के लिए विशेष साइबर विशेषज्ञों की तैनाती की है। ये विशेषज्ञ डिजिटल सबूत जुटाने और ऑनलाइन नेटवर्क की निगरानी कर रहे हैं। 4. एआई और हाईटेक डेटाबेस से 24 घंटे निगरानी
ड्रग तस्करों और अंतरराज्यीय नेटवर्क पर नजर रखने के लिए नैटग्रिड (एनएटीजीआरआईडी), निदान (एनआईडीएएएन), पीएआईएस (पंजाब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम), आईसीजेएस और फाइनेक्स जैसे आधुनिक डेटाबेस और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरणों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनके जरिए संदिग्धों की गतिविधियों, वित्तीय लेन-देन और राज्यों के बीच फैले नेटवर्क की तेजी से पहचान कर कार्रवाई की जा रही है।



Source link

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें