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चपरासी से कम ताकतवर मेयर मुद्दे पर सांसद बोले:मेयर शहर के विकास कराने में रहे नाकाम, अब खुद को बेबस दिखाने की कोशिश




चंडीगढ़ बीजेपी मेयर की पावर को लेकर दिए बयान पर राज्य की राजनीति गरमाई हुई है। इस मामले में शहर के सांसद मनीष तिवारी ने सेक्टर-22 में आयोजित एक जनसभा में बीजेपी को घेरा है। सांसद ने कहा कि खुद मान रहे हैं कि नगर निगम में उनकी कोई ताकत नहीं है और चपड़ासी की ज्यादा पावर है, तो फिर जनता को यह भी सोचना चाहिए कि ऐसे मेयर चुनने का क्या मतलब है। तिवारी ने आरोप लगाया कि पिछले दस वर्षों में बीजेपी के मेयर शहर के विकास में नाकाम रहे हैं और अब चुनाव नजदीक आते देख अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए खुद को बेबस दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। अब चार प्वाइंटों में जानिए नगर सांसद ने क्या कहा – 1. मेयर दुक्की है, तो आप क्यों बने : मेयर साहब का बयान आपने अखबारों में पढ़ा होगा। कहते हैं कि कारपोरेशन में चपरासी की ज्यादा पावर है। मेयर को तो कोई दुक्की नहीं समझता है। जब आप वोट डालोगे, तो इसे माइंड में रखना है। मेयर अगर दुक्की है और चपरासी की ज्यादा पावर है, तो आप मेयर किसलिए बने? फिर तो आपको पता ही था कि आपके पास कुछ नहीं है। 2. 10 साल में कुछ नहीं किया, 9 मेयर बीजेपी के : यह बात इसलिए नहीं की जा रही है कि क्यों मेयर या कारपोरेशन के सामने चुनौती है। यह बात इसलिए कही जा रही है कि पिछले दस सालों में नौ मेयर बीजेपी के रहे हैं। शहर का इन्होंने किया कुछ नहीं है। अब चुनाव में जब लोगों से जूतियां पड़ेंगी, तो अपने आप को बचाने के लिए कह रहे हैं कि हमारे पल्ले कुछ नहीं है। 3. फिर आपकी जुबान बंद क्यों थी : यह बात ध्यान से समझने की जरूरत है कि ऋषिकेश जाकर मेयर की मीटिंग में यह बात करते हो कि हम तो बिल्कुल पावरलेस होंगे। तो मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि आज से दो साल पहले जब मैंने लोकसभा में यह बिल रखा था, जैसे पांच साल के लिए लोगों द्वारा एमपी चुना जाता है, वैसे ही चुना जाना चाहिए। मेयर को सीनियर डिप्टी, डिप्टी मेयर को पावर होनी चाहिए। तो उस समय आपकी जुबान क्यों बंद थी? उस समय आपने इस बात को प्रमुखता से क्यों नहीं उठाया? क्यों नहीं जाकर गवर्नर, गृहमंत्री और प्रधानमंत्री को कहा? पिछले 12 साल में आपकी सरकार है। चंडीगढ़ का ढांचा बदलने की जरूरत है। 4. कारपोरेशन के पास जहर खाने को पैसे नहीं : अब बेचारे बनकर आपके सामने आने वाले हैं कि हम क्या करें जी। हमारे हाथ में तो कुछ नहीं है। शहर का बेड़ा गर्क करके रख दिया। 2016 में जब कारपोरेशन इनके हाथ में आई है, 500 करोड़ की एफडी थी, आज कारपोरेशन के पास जहर खाने का पैसा नहीं है। यह कैसे हुआ? पैसे कहां गए? 108 करोड़ रुपए का कारपोरेशन घोटाला होता है। बीजेपी के मेयर होने के बावजूद आज तक किसी पर कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे शुरू हुआ था यह विवाद
उत्तराखंड के ऋषिकेश में पिछले दिनों दो दिवसीय अखिल भारतीय महापौर परिषद का सम्मेलन हुआ। इस दौरान सौरभ जोशी ने मेयर की सीमित पावर पर कटाक्ष किया था। उन्होंने कहा कि हमसे अच्छा तो ऑफिस का चपरासी है। वह काम करवा सकता है, लेकिन मेयर नहीं। देश के 60 मेयरों की मौजूदगी में जोशी ने मेयर के डायरेक्ट चुनाव, पांच साल के कार्यकाल और नगर निगमों को ज्यादा प्रशासनिक व फाइनेंशियल पावर देने की मांग उठाई थी।



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