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किताब ‘बड़े चेते आऊंदे ने’ में कलाकारों की यादों को लिखा




बड़े चेते आऊंदे ने… वो लोग, जिन्होंने हमें कमाल का साहित्य दिया और हमारे जीवन में रंग लाने की कोशिश की। ऐसे कई कलाकारों को मैं निजी तौर पर मिला और उनसे जुड़े अनुभवों को मैंने शब्दों में पिरोना चाहा तो उन्हें किताब बड़े चेते औदे ने में लिखा। यह बताया नाटककार व लेखक संजीवन सिंह ने। इनकी किताब बड़े चेते आऊंदे ने का विमोचन शनिवार को सेक्टर-16 पंजाब कला भवन में हुआ। स्वप्न फाउंडेशन पटियाला और पंजाब कला परिषद की ओर से यह कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस मौके पर किताब पर चर्चा भी की गई। इसमें पंजाब कला परिषद के चेयरमैन स्वर्णजीत सवी, आलोचक डॉ. लाभ सिंह खीवा, स्वप्न फाउंडेशन पटियाला के महासचिव जगदीप सिद्धू, लेखक पाल अजनबी, गद्य लेखक सुरजीत सुमन, रंगकर्मी बलकार सिद्धू, नाटककार और कवि शब्दीश, भूपिंदर मलिक आदि शामिल हुए। हमने लेखक से उनकी किताब और लेखन के सफर पर बात की। लेखक और नाटककार संजीवन सिंह नाटक और वार्तक की 7 किताबें लिख चुके हैं। किताब को लिखने के ख्याल को लेकर संजीवन सिंह ने बताया- जब मैंने बलवंत गार्गी की लिखी सुरमे वाली अख किताब पढ़ी तो सोचा कि मुझे भी फनकारों के बारे में लिखना चाहिए। इप्टा में मैंने जिन कलाकारों के साथ काम किया, उनके साथ बिताए पल और अनुभवों को इसमें लिखा है। इनमें बीस से ज्यादा कलाकारों की बात है। रंगमंच से जुड़ने को लेकर बताया- हमारे मंडी गोबिंदगढ़ में रामलीला हुआ करती थी। मैंने उनकी रिहर्सल और प्रस्तुति देखते ही सोच लिया था कि इस ओर आगे बढ़ना है। लेखक और कवि संतोख सिंह धीर मेरे ताया जी हैं। बचपन से उनके साथ रहा। उनके साथ मैंने हमेशा खुद को किताबों में पाया। वह साहित्य से इतना जुड़े थे कि फौज में नौकरी छोड़कर उन्होंने केवल लेखन पर ध्यान दिया। दादा ज्ञानी ईशर सिंह दर्द, पिता रिपुदमन सिंह रूप भी साहित्य से जुड़े रहे। ऐसे में हम आगे उनके बच्चे आैर आगे हमारी पीढ़ी भी साहित्य से जुड़ी है। यादें सुरिंदर कौर और सुरजीत पातर की… जिन कलाकारों के साथ काम किया, उनसे जुड़ी याद को साझा करते हुए संजीवन सिंह ने कहा- लोकगायिका सुरिंदर कौर के बारे में सब जानते हैं। उनके गीत आज भी हमारी धड़कन हैं। बात 90 के दशक की है। एक कार्यक्रम के लिए मैंने सुरिंदर कौर का नाम सुझाव में दिया। लेकिन आयोजनकर्ताओं ने कहा कि सुरिंदर कौर की जगह गुरदास मान, हंसराज हंस जैसे कलाकारों को लाना चाहिए। मैं बेहद शर्मिंदा हुआ। 2003 में जब मैं इप्टा का जनरल सेक्रेटरी बना, तो फिर कई साल बाद मैं दोबारा सुरिंदर कौर को मिला। तब वह बजुर्ग हो चुकी थीं। उनके सारे काम उनकी बेटी डौली गुलेरिया संभालती थी। हमने सुरिंदर कौर जी की प्रस्तुति करवाई। उन्होंने बैठे-बैठे अपनी बेटी के साथ धीयां ते मांवा गीत गाया था। वहीं डॉ. सुरजीत पातर के जाने से कुछ दिन पहले हमारी मुलाकात पंजाब कला भवन में हुई थी। उन्होंने कहा था- यार संजीवन, मैं चाहता हूं जब दुनिया से जाऊं तो लोग मुझे यहां के प्रधान नहीं, बल्कि कवि के रूप में याद करें। मैं अब यह सब छोड़ दूंगा। तब मैंने कहा था- मुझे भी अब केवल कला की ओर जाना है।



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