चंडीगढ़37 मिनट पहले
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट प्रतीकात्मक फोटो।
हरियाणा में महज 7,299 रुपए के यात्रा भत्ता (TA) बिल के भुगतान को लेकर शुरू हुआ विवाद 19 साल तक अदालतों में चलता रहा। आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार की नियमित द्वितीय अपील खारिज करते हुए इस मामले का पटाक्षेप कर दिया। इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने सरकारी विभागों की उस प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए, जिसमें छोटी-छोटी रकम के मामलों में वर्षों तक मुकदमेबाजी जारी रखी जाती है।
हाईकोर्ट की जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने स्पष्ट किया कि जब मूल वाद की राशि 25 हजार रुपए से कम हो तो सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 102 के तहत नियमित द्वितीय अपील दायर ही नहीं की जा सकती। ऐसे में हरियाणा सरकार की अपील सुनवाई योग्य नहीं थी।
7 हजार के विवाद में 19 साल की कानूनी लड़ाई
मामला रोहतक के कर्मचारी ओपी खन्ना से जुड़ा है, जिन्होंने दिसंबर 1999 से अप्रैल 2002 के बीच सरकारी दौरों से संबंधित 7,299 रुपए के लंबित टीए बिलों के भुगतान के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। विभाग ने बजट की कमी और कुछ आपत्तियों का हवाला देकर भुगतान रोक रखा था।
वर्ष 2006 में सिविल जज ने खन्ना का दावा खारिज कर दिया, लेकिन 2007 में जिला जज ने फैसला पलटते हुए कर्मचारी के पक्ष में आदेश दे दिया। इसके बाद हरियाणा सरकार हाई कोर्ट पहुंच गई और मामला 2026 तक चलता रहा।
कोर्ट ने उठाया बड़ा सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि कई बार सरकारी विभाग विवादित राशि से कई गुना अधिक पैसा मुकदमेबाजी पर खर्च कर देते हैं। कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में सरकारी संसाधनों और न्यायपालिका के समय का अनावश्यक उपयोग होता है।
ब्यूरोक्रेसी की कार्यशैली पर भी सवाल
यह फैसला केवल 7,299 रुपए के टीए बिल का नहीं, बल्कि सरकारी विभागों की निर्णय प्रक्रिया पर भी सवाल खड़ा करता है। जिस राशि का भुगतान दो दशक पहले किया जा सकता था, उसके लिए सरकार ने 19 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में समय पर प्रशासनिक निर्णय लेने से सरकारी खजाने और न्यायिक व्यवस्था दोनों पर अनावश्यक बोझ कम हो सकता है।








