हरियाणा में नगर निकाय चुनाव से ठीक पहले राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) के एक लेटर ने आरक्षण व्यवस्था को लेकर विवाद खड़ा कर दिया है। 23 अप्रैल को जारी इस लेटर के एक बिंदु ने न केवल प्रशासनिक हलकों में बल्कि कानूनी और सामाजिक मंचों पर भी तीखी बहस छेड़ दी है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अधिवक्ता हेमंत कुमार ने इस मुद्दे को उठाते हुए राज्य के शीर्ष अधिकारियों राज्य निर्वाचन आयुक्त, शहरी स्थानीय निकाय विभाग और विधि विभाग को शिकायत भेजकर इस भ्रमित और संभावित भेदभावपूर्ण स्थिति पर तत्काल स्पष्टीकरण मांगा है। जबकि कल (सोमवार) नाम वापसी का आखिरी दिन है। जानिए पूरा विवाद राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा 12 जिलों अंबाला, पंचकूला, सोनीपत, फतेहाबाद, हिसार, कैथल, करनाल, झज्जर, महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, रोहतक और यमुनानगर के उपायुक्तों को भेजे गए निर्देशों में कहा गया है कि, अन्य राज्यों से आए एससी व्यक्तियों को हरियाणा में एससी आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। दूसरे राज्य की एससी महिला, यदि हरियाणा के नॉन एससी पुरुष से विवाह करती है, तो उसे भी आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। लेटर के दूसरे बिंदु में एससी महिला रिजर्वेशन पर स्पष्टता नहीं
यहीं से शुरू हुआ बड़ा सवाल शिकायत में सबसे बड़ा सवाल यही उठाया गया है कि क्या इसका मतलब यह है कि अगर कोई दूसरे राज्य की एससी महिला हरियाणा के एससी पुरुष से विवाह करती है, तो उसे आरक्षण मिल सकता है? अगर हां, तो फिर नॉन-एससी पुरुष से विवाह करने पर उसे यह अधिकार क्यों नहीं? दोहरे मापदंड का सीधा आरोप अधिवक्ता हेमंत कुमार ने सवाल उठाया कि क्या एक ही वर्ग की महिलाओं के साथ सिर्फ उनके पति की जाति के आधार पर अलग-अलग व्यवहार करना संविधान की भावना के खिलाफ नहीं है? उन्होंने स्पष्ट कहा कि या तो सभी मामलों में ऐसी महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिले, या फिर किसी को भी न मिले। पति की जाति के आधार पर भेदभाव पूरी तरह अनुचित और असंवैधानिक है। कानूनी चुनौती के संकेत विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि आयोग जल्द स्पष्टता नहीं देता, तो यह मामला कोर्ट तक जा सकता है। यह मुद्दा सीधे तौर पर समानता के अधिकार और आरक्षण नीति की व्याख्या से जुड़ा हुआ है। शिकायत में मांग की गई है कि इस विवादित बिंदु पर आधिकारिक और स्पष्ट स्पष्टीकरण तुरंत जारी किया जाए। ताकि चुनाव प्रक्रिया के दौरान किसी भी प्रकार का भ्रम या भेदभाव न हो। नगर निकाय चुनाव से पहले उठे इस विवाद ने राजनीतिक माहौल भी गर्म कर दिया है। महिला अधिकारों और आरक्षण नीति को लेकर यह मुद्दा आने वाले दिनों में बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है।
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