सोनीपत में मंगलवार को तेंदुए द्वारा नंदनौर गाँव के किसान पर हमले किए जाने के बाद बुधवार को भी लगातार वाइल्डलाइफ टीम में निगरानी किए हुए हैं और ऐसे में लगातार अन्य जगहों पर भी फुट मार्क के ढूंढ रही है। लेकिन अभी तक टीम को कोई सफलता हाथ नहीं लगी है।
दूसरी तरफ गांव के लोगों में दहशत का माहौल है। लोग अपने खेतों में भी जाने से डर रहे हैं। वहीं बुधवार को कुछ घंटे के बाद सर्च अभियान करने के बाद वाइल्डलाइफ टीम वापस लौट जाएगी।
तेंदुए के सर्च अभियान को लेकर कल से लगातार कोशिश की जा रही है। अभी तक कोई भी जानकारी नहीं लग पाई है। ग्रामीणों को सतर्क रहने की चेतावनी दी गई है।
सोनीपत के गांव नांदनौर निवासी सुनील ने बताया कि मंगलवार को उसके पिता धर्मपाल (60) रोजाना की तरह सुबह करीब 6 बजे घर से खेत के लिए निकले थे। करीब 6:30 बजे जैसे ही वे खेत में पहुंचे, अचानक एक तेंदुए ने उन पर हमला कर दिया। यह हमला इतना अचानक था कि धर्मपाल को संभलने का मौका तक नहीं मिला। शरीर के कई हिस्सों पर किए गए वार परिजनों के अनुसार तेंदुए ने धर्मपाल की गर्दन, कमर, छाती और बाजू सहित शरीर के कई हिस्सों पर हमला किया। हमले में वे गंभीर रूप से घायल हो गए। घायल अवस्था में उन्होंने शोर मचाया, जिसके बाद आसपास के लोग मौके पर पहुंचे। धर्मपाल की चीख-पुकार सुनकर जब आसपास के लोग मौके पर पहुंचे तो तेंदुआ वहां से भाग गया। घटना के बाद पूरे इलाके में हड़कंप मच गया और लोगों में डर का माहौल बन गया। वहीं घायल धर्मपाल का इलाज जारी है। पुलिस और वन विभाग ने संभाला मोर्चा मंगलवार को घटना की सूचना तुरंत पुलिस को दी गई। मुरथल थाना पुलिस मौके पर पहुंची और हालात का जायजा लिया। साथ ही फॉरेस्ट विभाग और वाइल्डलाइफ टीम को भी सूचित किया गया, जिसके बाद संयुक्त रूप से सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया। हालांकि दूसरे दिन भी टीम लगातार सर्च कर रही है। लेकिन अभी तक सफलता हाथ नहीं लगी है। फॉरेस्ट विभाग के रेंज अधिकारी नरेश ने बताया कि मौके पर तेंदुए के फुट मार्क मिले हैं, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि हमला तेंदुए ने ही किया है। उन्होंने बताया कि एक पेड़ के नीचे मिले निशानों से इसकी पुष्टि हुई है।
रेस्क्यू टीम ने आसपास के गांवों और यमुना नदी के किनारे दूर-दूर तक सर्च अभियान चलाया, लेकिन अभी तक तेंदुए का कोई सुराग नहीं मिला है। टीम लगातार इलाके में खोजबीन कर रही है। तेंदुए को पकड़ने के लिए लगाए गए पिंजरे मंगलवार को वाइल्डलाइफ टीम ने तेंदुए को पकड़ने के लिए इलाके में पिंजरे लगाए हैं। लेकिन अभी तक तेंदुए के होने की कोई जानकारी दाेबारा नहीं मिली है। टीम में शामिल डॉक्टर खासा को भी मौके पर बुलाया गया है, जो तेंदुए के मिलने पर उसे बेहोश कर सुरक्षित पकड़ने का प्रयास करेंगे।
ग्रामीणों को दी गई सतर्क रहने की सलाह फॉरेस्ट विभाग ने ग्रामीणों को चेतावनी दी है कि वे रात और सुबह के समय अकेले खेतों में न जाएं। कम से कम तीन-चार लोगों के साथ ही खेतों की ओर जाएं और शोर करते हुए निकलें, ताकि किसी जंगली जानवर के हमले से बचा जा सके। घटना के बाद गांव में मुनादी करवा दी गई है ताकि सभी लोग सतर्क रहें। तेंदुए की मौजूदगी की आशंका के चलते पूरे इलाके में डर का माहौल बना हुआ है। वहीं, घायल किसान धर्मपाल का एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। डॉक्टरों की निगरानी में उनका उपचार जारी है और उनकी हालत पर लगातार नजर रखी जा रही है।
सिलसिलेवार ढंग से पढ़िए… कि कैसे तेंदुए को ट्रैप किया जाता है?
सोनीपत में तेंदुए की दस्तक से बढ़ी सतर्कता, एक्सपर्ट टीम एक्टिव: सोनीपत के यमुना किनारे तेंदुए की मौजूदगी की आशंका ने वन विभाग और स्थानीय प्रशासन को अलर्ट मोड पर ला दिया है। ग्रामीण इलाकों में दहशत का माहौल है, वहीं विभाग पूरी रणनीति के साथ तेंदुए को सुरक्षित पकड़ने की तैयारी में जुटा हुआ है। इस पूरे ऑपरेशन को बेहद सावधानी और वैज्ञानिक तरीके से अंजाम दिया जाता है ताकि न तो इंसानों को नुकसान हो और न ही जंगली जानवर को किसी तरह की हानि पहुंचे।
ट्रैंक्विलाइज़र गन से किया जाता है काबू: तेंदुए को पकड़ने के लिए सबसे अहम भूमिका ट्रैंक्विलाइज़र गन (डार्ट गन) निभाती है। एक्सपर्ट डॉक्टर खासा इस गन का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें बेहोशी की दवा से भरा डार्ट (सुई) जानवर पर फायर किया जाता है। डार्ट लगते ही कुछ समय बाद तेंदुआ बेहोश हो जाता है, जिससे उसे बिना किसी संघर्ष के सुरक्षित तरीके से काबू में किया जा सकता है।
पिंजरे में जाल बिछाकर किया जाता है ट्रैप :तेंदुए को पकड़ने का एक पारंपरिक और प्रभावी तरीका पिंजरे का ट्रैप भी है। इसमें पिंजरे के अंदर एक जीवित जानवर को रखा जाता है, जिससे तेंदुआ आकर्षित होकर वहां पहुंचता है। जैसे ही तेंदुआ उस जानवर पर हमला करने की कोशिश करता है, ट्रैप मैकेनिज्म एक्टिव हो जाता है और पिंजरा बंद हो जाता है। इस तरह तेंदुआ बिना खुले संघर्ष के कैद हो जाता है।
डोज तय करने में बरती जाती है विशेष सावधानी: तेंदुए को बेहोश करने के दौरान सबसे महत्वपूर्ण पहलू दवा की सही मात्रा तय करना होता है। यह डोज उसके वजन और बॉडी स्ट्रक्चर के अनुसार दी जाती है। यदि दवा कम दी जाए तो जानवर पूरी तरह बेहोश नहीं होगा, और ज्यादा होने पर उसकी जान को खतरा हो सकता है। यही कारण है कि रोहतक से विशेषज्ञ डॉक्टर खासा को बुलाया गया है, जो इस प्रक्रिया को सुरक्षित तरीके से अंजाम देते हैं।
तेंदुए के मूवमेंट पर रखी जाती है नजर: वन विभाग द्वारा यह पूरी प्रक्रिया तभी शुरू की जाती है जब तेंदुए की मौजूदगी की पुष्टि या उसके दोबारा दिखने की संभावना होती है। इसके लिए टीम लगातार इलाके में निगरानी करती है, कैमरे लगाए जाते हैं और स्थानीय लोगों से भी जानकारी जुटाई जाती है। पुख्ता इनपुट मिलने के बाद ही ट्रैपिंग ऑपरेशन शुरू किया जाता है।
यमुना किनारे क्यों पहुंचा तेंदुआ: रेंज ऑफिसर नरेश के अनुसार, तेंदुए का यमुना नदी के किनारे पहुंचना स्वाभाविक है। यहां उसे पीने के लिए पानी और शिकार के लिए छोटे जंगली जानवर आसानी से मिल जाते हैं। यही कारण है कि वह अपने प्राकृतिक आवास से निकलकर इस क्षेत्र तक पहुंच गया होगा।
पकड़ने के बाद सुरक्षित जंगल में छोड़ा जाता है: तेंदुए को पकड़ने के बाद उसे किसी भी हालत में नुकसान नहीं पहुंचाया जाता। बेहोश अवस्था में उसे सुरक्षित पिंजरे में डालकर वन विभाग की टीम द्वारा यमुनानगर के जंगलों या किसी उपयुक्त प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया जाता है, ताकि वह फिर से अपने प्राकृतिक जीवन में लौट सके।
यह पूरा ऑपरेशन बेहद संवेदनशील और तकनीकी होता है, जिसमें एक छोटी सी चूक भी खतरनाक साबित हो सकती है। इसलिए वन विभाग हर कदम सोच-समझकर और विशेषज्ञों की निगरानी में उठाता है।
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