सिरसा की चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय (सीडीएलयू) द्वारा एडजंक्ट फैकल्टी एवं प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के संविदा पदों पर भर्ती में आरक्षण नीति का पालन न किए जाने का मामला अब हाई कोर्ट पहुंच गया है। हाई कोर्ट ने सीडब्ल्यूपी संख्या 20654- 2026, कमल कुमार एवं अन्य बनाम मामले में सुनवाई करते हुए यूनिवर्सिटी को निर्देश दिए है कि संविदा नियुक्तियों में हरियाणा सरकार की आरक्षण नीति तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाए। इसे लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ ने शुक्रवार को अंतरिम आदेश पारित किया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट परमेन्द्र सिंह के अनुसार, उन्होंने कोर्ट में ये तर्क रखा कि यूनिवर्सिटी द्वारा 26 जून 2026 एवं 30 जून 2026 को जारी विज्ञापनों में आरक्षित वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं किया गया तथा रिक्तियों की संख्या भी स्पष्ट नहीं की गई, जो हरियाणा सरकार की आरक्षण नीति एवं यूजीसी के दिशा-निर्देशों के विपरीत है। कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया कि सरकार तथा यूजीसी के 16 फरवरी 2026 के निर्देशों के अनुसार आरक्षित नीति का पालन किया जाए। कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के कुलपति एवं कुलसचिव को याचिका में उठाए गए तथ्यों के संबंध में अपना लिखित जवाब दाखिल करने को कहा है। साथ ही मामले में नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 25 अगस्त तय की है। इस बारे में वीसी प्रो. विजय कुमार को दो बार फोन से संपर्क किया गया, पर कोई जवाब नहीं मिला। सरकार-यूजीसी के नियमों की अवहेलना अवमानना होगी उल्लेखनीय है कि हरियाणा सरकार तथा यूजीसी दोनों ने यह स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि 45 दिनों या उससे अधिक अवधि की अस्थायी/संविदा नियुक्तियों में भी आरक्षण नीति का पालन अनिवार्य होगा। विश्वविद्यालयों सहित सभी सरकारी संस्थानों को इन निर्देशों का अक्षरशः पालन करना आवश्यक है। ऐसे में सीडीएलयू सिरसा के कुलपति एवं विश्वविद्यालय प्रशासन पर यह कानूनी जिम्मेदारी है कि एडजंक्ट फैकल्टी एवं प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस की संविदा भर्ती में आरक्षण नीति का पूर्ण पालन करे। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन हाई कोर्ट के आदेशों एवं लागू सरकारी निर्देशों की अवहेलना करते हुए आरक्षण नीति लागू नहीं करता है तो यह कोर्ट के आदेशों की अवमानना होगी। यह निर्णय अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तथा अन्य आरक्षित वर्गों के पात्र अभ्यर्थियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे भविष्य में विश्वविद्यालयों एवं अन्य शैक्षणिक संस्थानों में होने वाली संविदा नियुक्तियों में पारदर्शिता, समान अवसर तथा आरक्षण नीति के प्रभावी क्रियान्वयन को बल मिलेगा।
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सीडीएलयू सिरसा में अस्थायी भर्तियों का विवाद पहुंचा हाईकोर्ट:आरक्षण नीति का पालन करने के सख्त निर्देश, वीसी से मांगा जवाब
