हत्या के एक मामले में पंजाब पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि पुलिस ने अपने चालान में एक ऐसे व्यक्ति का बयान शामिल कर दिया, जिसकी मृत्यु कथित बयान दर्ज होने की तारीख से करीब चार महीने पहले हो चुकी थी। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस तथ्य को बेहद गंभीर मानते हुए कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने साफ कहा कि यह कोई साधारण गलती नहीं है और सवाल उठाया कि एक मृत व्यक्ति बाद में पुलिस रिकॉर्ड में बयान कैसे दे सकता है। वकील का पुलिस जांच पर सवाल
यह मामला उस समय सामने आया, जब अदालत में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई चल रही थी। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए एक महत्वपूर्ण तथ्य अदालत के सामने रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस द्वारा पेश किए गए चालान में 19 सितंबर 2025 की तारीख का एक गवाह का बयान शामिल किया गया है। बचाव पक्ष ने आगे दलील दी कि जिस व्यक्ति का यह बयान दिखाया गया है, उसकी मृत्यु पहले ही 29 मई 2025 को हो चुकी थी। यानी जिस तारीख को बयान दर्ज होना बताया गया है, उस समय वह व्यक्ति जीवित ही नहीं था। इस तरह दस्तावेजों में दर्ज तारीखें आपस में पूरी तरह विरोधाभासी पाई गईं। तारीखों में इस स्पष्ट असंगति को देखते ही अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने माना कि यह सामान्य गलती नहीं हो सकती और तुरंत हस्तक्षेप करते हुए पुलिस से इस पर जवाब मांगा, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह लापरवाही है या फिर किसी तरह की बड़ी गड़बड़ी। हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी
जस्टिस सुमित गोयल की पीठ ने पूरे मामले पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे “अस्पष्ट, अकल्पनीय और न्यायिक चेतना को झकझोरने वाला” करार दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में जो तथ्य सामने आए हैं, वे सामान्य नहीं हैं और इस तरह की स्थिति न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पहली नजर में रिकॉर्ड सही पाया जाता है, तो इसे केवल एक साधारण लापरवाही मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बल्कि यह गंभीर अनियमितता, दस्तावेजों में संभावित गड़बड़ी या जांच प्रक्रिया में किसी बड़े स्तर की चूक का संकेत हो सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सच्चाई सामने लाना बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे न केवल संबंधित केस प्रभावित होता है, बल्कि पूरी जांच प्रणाली और कानून व्यवस्था पर लोगों का भरोसा भी जुड़ा होता है। इसलिए मामले की निष्पक्ष और गहन जांच होना आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह गलती कैसे हुई और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। हाईकोर्ट ने दिए जांच के आदेश
हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए गहन जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने पंजाब के स्पेशल डीजीपी (लॉ एंड ऑर्डर) को कहा है कि वे खुद इस मामले की जांच की निगरानी करें और पूरी रिपोर्ट शपथपत्र के साथ कोर्ट में पेश करें। यानि जांच में जो भी सच सामने आएगा, उसकी जिम्मेदारी सीधे वरिष्ठ अधिकारी की होगी और उन्हें इसे प्रमाणित रूप में अदालत के सामने रखना होगा। इसके साथ ही अदालत ने संबंधित थाना प्रभारी (एसएचओ) को भी कड़ी हिदायत दी है कि वे अगली सुनवाई के दौरान केस डायरी सहित व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहें। केस डायरी में जांच से जुड़े सभी रिकॉर्ड, साक्ष्य, गवाहों के बयान और कार्रवाई का पूरा ब्यौरा होता है, जिससे अदालत यह समझ सकेगी कि जांच किस तरह की गई और कहां चूक हुई। सीबीआई जांच का विकल्प भी खुला
अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि अगर राज्य पुलिस सही और संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती, तो जांच सीबीआई को दी जा सकती है। यानि कोर्ट चाहता है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और इसके लिए वह किसी भी स्तर तक कदम उठा सकता है। कोर्ट ने यह भी जोर देकर कहा कि हत्या जैसे गंभीर मामलों में दस्तावेजों में किसी तरह की गड़बड़ी, गलत जानकारी दर्ज करना या तथ्यों से छेड़छाड़ करना बेहद गंभीर अपराध है और इसे किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, ऐसी लापरवाही या जानबूझकर की गई गलती न केवल जांच की विश्वसनीयता को प्रभावित करती है, बल्कि न्याय प्रक्रिया को भी कमजोर करती है।
बताया गया है कि यह एफआईआर अगस्त 2025 में लुधियाना में हत्या समेत गंभीर धाराओं में दर्ज हुई थी। लेकिन अब इस मामले में सबसे बड़ा सवाल जांच की निष्पक्षता और भरोसे पर उठ रहा है। हाई कोर्ट ने अगली सुनवाई 18 मई तय की है और संकेत दिया है कि अगर रिकॉर्ड में गड़बड़ी या फर्जीवाड़ा साबित हुआ, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
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