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दहेज प्रताड़ना मामले में सजा का मतलब नौकरी से बर्खास्तगी नहीं, हाईकोर्ट ने बैंक के फैसले को पलटा



चंडीगढ़ | हाई कोर्ट ने उन लाखों पक्षकारों को बड़ी राहत दी है, जिनकी धन राशि अदालतों में निष्पादन (एग्जीक्यूशन) कार्यवाही के दौरान लंबे समय तक बिना ब्याज के निष्क्रिय पड़ी रहती थी। जस्टिस पंकज जैन ने एक अहम आदेश देते हुए पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ की सभी अदालतों को निर्देश दिया है कि ऐसी प्रत्येक राशि को तत्काल किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में ब्याज वाली सावधि जमा (फिक्स्ड डिपाजिट) के रूप में रखा जाए। हाई कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि इस संबंध में आवश्यक दिशा निर्देश तैयार करने के लिए मामले को चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जाए। जस्टिस पंकज जैन ने स्पष्ट किया कि अदालत की लंबी प्रक्रिया के कारण किसी भी पक्षकार को आर्थिक नुकसान नहीं होना चाहिए। यदि धनराशि बिना ब्याज के पड़ी रहती है, तो बाद में ब्याज की गणना को लेकर होने वाले विवाद अदालतों का और समय बर्बाद करते हैं। कोर्ट ने कहा कि अदालत की कार्रवाई किसी भी पक्ष के लिए आर्थिक नुकसान का कारण नहीं बननी चाहिए। हाई कोर्ट ने कहा कि निष्पादन कार्यवाही में प्राप्त होने वाली राशि को निष्क्रिय न छोड़ें, उसे तुरंत राष्ट्रीयकृत बैंक की एफडी में जमा कराएं। भास्कर खास पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पति या ससुराल पक्ष द्वारा क्रूरता के तहत सजा होने का मतलब यह कतई नहीं है कि कर्मचारी को स्वतः ही नैतिक पतन का दोषी मानकर नौकरी से निकाल दिया जाए। कोर्ट ने कहा कि सेवा से हटाने जैसा गंभीर निर्णय लेने से पहले प्राधिकारियों को मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का स्वतंत्र मूल्यांकन करना होगा। यह मामला एक सरकारी बैंक के एक पूर्व शाखा प्रबंधक से जुड़ा है। वर्ष 2000 में याचिकाकर्ता के खिलाफ दहेज मृत्यु, दहेज प्रताड़ना और क्रूरता का केस दर्ज हुआ था। सत्र अदालत ने उन्हें दहेज मृत्यु के आरोपों से तो बरी कर दिया लेकिन दहेज प्रताड़ना के मामले में तीन वर्ष की कैद की सजा सुनाई। बाद में हाईकोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी। इसके बाद बैंक ने इसे नैतिक पतन मानते हुए बिना किसी स्वतंत्र जांच के उन्हें नौकरी से निकाल दिया था। कोर्ट ने बैंक के आदेश को मनमाना बताते हुए इसे रद्द कर दिया और कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि दहेज प्रताड़ना का हर अपराध नैतिक पतन ही माना जाए। कोर्ट ने जोर दिया कि बैंक ने सुप्रीम कोर्ट के तय सिद्धांतों का पालन नहीं किया। बैंक को अपने स्तर पर यह देखना चाहिए था कि क्या कर्मचारी का अपराध उसकी ड्यूटी या बैंक की छवि को इस कदर नुकसान पहुंचाता है कि उसे हटाना अनिवार्य हो।



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