पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक फैसले में झूठी रिश्वत शिकायत करने के आरोपी व्यक्ति को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति की शिकायत के आधार पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज होता है और बाद में शिकायत झूठी साबित हो जाती है, तो शिकायतकर्ता के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। जस्टिस मनीषा बत्रा ने गुरदेव सिंह की याचिका खारिज करते हुए निचली अदालतों के आदेशों को बरकरार रखा। इसके साथ ही उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 182 के तहत चल रही कार्रवाई जारी रखने का रास्ता साफ हो गया है। हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों के आदेश सही हैं और उनमें कोई कानूनी गलती नहीं है। इसी कारण अदालत ने गुरदेव सिंह की याचिका खारिज कर दी। अब उसके खिलाफ झूठी शिकायत देने के मामले में कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी। अब 4 पॉइंट्स में पढ़ें क्या है पूरा मामला:- हाईकोर्ट ने दोनों दलीलें ठुकराईं हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत झूठी होने का तथ्य डॉक्टर के बरी होने के बाद 1 अप्रैल 2009 को सामने आया था। इसके बाद 3 नवंबर 2009 को कलंदरा दायर किया गया, जो कानून में निर्धारित एक वर्ष की अवधि के भीतर था। इसलिए कार्रवाई समय-सीमा से बाहर नहीं मानी जा सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस विभाग के डीएसपी स्तर के अधिकारी के समक्ष शिकायत दर्ज हुई थी, उसी विभाग के समान रैंक के दूसरे अधिकारी द्वारा कलंदरा दायर किया जाना पूरी तरह वैध है। ऐसे मामलों में अधिकारी का नाम नहीं, बल्कि उसका पद और विभाग महत्वपूर्ण होता है।
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