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खुम्बु आइसफॉल पर रुका एवरेस्ट पर्वता​रोहियों का मिशन:गाइड्स को एयरलिफ्ट कराने की तैयारी; ‘एवरेस्ट की सेहत’ सुधारने में जुटे आइसफॉल डॉक्टर




समुद्र तल से 17 हजार फीट की ऊंचाई, एवरेस्ट की कठिन डगर और चारों तरफ पसरा मौत सा सन्नाटा… यहां हवा की एक सरसराहट भी दिल की धड़कनें बढ़ा देती है, क्योंकि एक जरा सी चूक सीधे गहरी खाई या बर्फ की कब्र में ले जा सकती है। इसी बर्फीले नर्क के बीच खड़ा है एक शख्स, जिसे दुनिया ‘आइसफॉल डॉक्टर’ कहती है। दावा जांगबू शेर्पा के लिए माउंट एवरेस्ट सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि ‘मरीज’ है, जिसकी सांसों की नब्ज वह हर दिन टटोलता है। पर इस हफ्ते, खुम्बु आइसफॉल के उस दो मील के खतरनाक हिस्से ने दावा और उनकी 11 सदस्यीय विशिष्ट टीम को भी खौफ में डाल दिया है। भारी बर्फबारी के कारण बहुत बड़ी नीलीस-सफेद बर्फ की दीवार (सेराक) रास्ते में खड़ी हो गई है। यह दीवार इतनी विशाल है कि इसे पार करना बेहद खतरनाक है। फिलहाल ग्राउंड जीरो पर कोशिशों में जुटे जागंबू बताते हैं,‘रास्ते हर साल बंद होते हैं, पर मैंने अपनी जिंदगी में बर्फ का ऐसा पहाड़ रास्ते के बीच कभी नहीं देखा। हमने ड्रोन उड़ाकर देखा है, इसे पार करना अभी नामुमकिन है।’ यह मामूली रुकावट नहीं है, बल्कि एक ऐसी मौत की दीवार है जिसने सैकड़ों पर्वतारोहियों के सपनों को बेस कैंप में ही कैद कर दिया है।’ जांगबू कहते हैं ‘बेस कैंप अब एक तंबू के शहर में तब्दील हो चुका है, जहां 400 से ज्यादा पर्वतारोही टकटकी लगाए उस दीवार के पिघलने का इंतजार कर रहे हैं। चढ़ाई का समय तेजी से खत्म हो रहा है। नेपाल सरकार के लिए यह बड़ा राजस्व का मामला है, इसलिए विचार किया जा रहा है कि अगर एक-दो दिन में दीवार नहीं पिघली, तो गाइड्स को एयरलिफ्ट कर ऊपर पहुं‍चाया जाए। पहाड़ पर तीन बार फतह हासिल कर चुके दावा जांगबू जानते हैं कि रास्ता खुलने के बाद भी चुनौती कम नहीं होगी। सैकड़ों लोगों का एक साथ उस संकरे रास्ते से गुजरना एक नई मुसीबत को दावत देगा। जांगबू की नजरें अभी भी उस सफेद दीवार पर टिकी हैं- उन्हें इंतजार है कि कब उनका ‘मरीज’ उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता देगा। क्योंकि एवरेस्ट पर, आखिरी फैसला हमेशा पहाड़ का ही होता है। खतरा, इसी जगह पर 2014 में 16 गाइड्स की मौत हुई थी आइसफॉल डॉक्टर्स का काम दुनिया के सबसे खतरनाक पेशों में गिना जाता है। ये जांबाज उस वक्त पहाड़ पर चढ़ते हैं जब कोई और वहां जाने की सोच भी नहीं सकता। दरकते ग्लेशियरों के बीच रस्सियां बांधना और रसातल जैसी गहरी दरारों पर एल्युमीनियम की सीढ़ियां टिकाना बड़ी चुनौती रहती है। पर इस साल, खतरा पहले से कहीं ज्यादा है। अप्रैल 2014 की घटना इन शेरपाओं के जेहन में अब भी ताजा है, जब इसी जगह बर्फ की दीवार गिरने से 16 गाइड्स की मौत हो गई थी। वह एवरेस्ट के इतिहास का सबसे भीषण दिन था। स्थिति वैसी ही है और सुरक्षा से समझौता करना खुदकुशी के बराबर है।



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