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इरशाद-उसे ढूंढता हूं जो पहली बार कैम्पस आया था, सरताज-पीयू ने गायक से शायर बनाया




पंजाब यूनिवर्सिटी एलुमनाई एसोसिएशन और चंडीगढ़ सिटीजंस फाउंडेशन की ओर से रविवार को सेक्टर-25 के पंजाब यूनिवर्सिटी कन्वेंशन सेंटर में ‘’लफ्ज़, सुर और सफर’’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। जहां मशहूर गीतकार शायर- डॉ. इरशाद कामिल और शायर- गायक व संगीतकार डॉ. सतिंदर सरताज ने अपने जीवन के ऐसे किस्से साझा किए, जिन्होंने लोगों को कभी हंसाया, भावुक किया तो कभी सपनों का पीछा करने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम का संचालन डॉ. पुष्पिंदर स्याल और डॉ. अर्चना आर सिंह ने किया। इरशाद }7 नंबर की बस पकड़ी थी उस दिन… इरशाद कामिल ने पुराने दिनों में लौटते हुए बताया-मैं आज भी उस लड़के को ढूंढ़ता हूं जो पहली बार मालेरकोटला से यहां आया था। 7 नबंर की बस पकड़ी और कैम्पस पहुंचा। उस दिन गेट पर कई पुलिसकर्मी थे। मुझे लगा यहां जरूर कोई बड़ी घटना हुई है। 15-20 मिनट बाहर ही खड़ा रहा। बाद में अंदर आकर हिंदी विभाग ढूंढ़ा। इस नई दुनिया ने बाद में इरशाद की कल्पना को पंख दिए जो उन्हें उड़ाकर बॉलीवुड के सबसे चर्चित और मकबूल गीतकार बनाने के मुकाम तक ले गए। उन्होंने आगे बताया- मैं बचपन में प्लास्टिक की थैलियों में मिलने वाली मीठी गोलियां और फिल्मों के किरदारों वाली तस्वीरें इकट्ठा करता था। फिर उन किरदारों को आपस में बांटकर कहानियां बनाता । शायद वही खेल आगे चलकर मेरे भीतर कहानी और किरदार गढ़ने की क्षमता बन गया। अपने नाम के बारे में वे बोले-मेरे नाम के साथ जुड़ा “इरशाद” भी रेडियो की दुनिया से आया। इरशाद ऑडियंस से यकीनन इरशाद युवाओं को सलाह देते हुए कहा-अगर कोई व्यक्ति लगातार 31 दिन तक हर रात सोने से पहले एक नज़्म पढ़े, तो उसके भीतर बदलाव जरूर महसूस होगा। सरताज }बस नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाना था… सतिंदर सरताज ने कहा- पंजाब यूनिवर्सिटी मेरे लिए सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि असली पहचान की जन्मस्थली है। जब तक मैं इस कैंपस में नहीं आया था , तब तक सिर्फ गाता था। इस यूनिवर्सिटी ने मुझे शायर बनाया और फनकारी की नई पहचान दी। उन्होंने कहा-मेरा सपना कभी बड़ा गायक बनने का नहीं था। बस यही चाहता था कि मेरे नाम के आगे “डॉक्टर” लगे और संगीत के प्रोफेसर बनूं। जिन दोस्तों का पेपर पास होता, उनके घर जाकर गा देता। वहीं से लोगों ने मुझे नोटिस करना शुरू किया। अपनी पहली अलबम के बारे में सरताज ने बताया- वर्ष 2003 में पहली एल्बम ‘’इबादत’’ रिकॉर्ड हुई। 2006-07 में किसी ने मेरे वीडियो यूट्यूब पर डाल दिए। एक दिन कनाडा से कार्यक्रम का फोन आया तो विश्वास ही नहीं हुआ। जल्दी से कैफे पहुंचा और पहली बार यूट्यूब पर अपना नाम खोजा। इसके बाद विदेशों में कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हो गया। पीयू में अपने पहले प्रोग्राम के बारे में उन्होंने कहा। यहां ईवनिंग ऑडिटोरियम में लगा मेरा पहला होर्डिंग आज भी सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल है और उस दिन जो कुर्ता पहना हुआ था उसे आज भी संभालकर रखा है। सोशल मीडिया पर गानों की पैरोडी और मीम्स को लेकर पूछे गए सवाल पर इरशाद कामिल ने कहा कि जब कोई गीत लोगों का हो जाता है तो उस पर लेखक का अधिकार नहीं रह जाता। लोग उसे अपने तरीके से सुनते और समझते हैं, यही उसकी असली सफलता है। वहीं सतिंदर सरताज ने कहा कि अगर किसी पैरोडी से किसी का नुकसान नहीं हो रहा और हजारों लोगों को खुशी मिल रही है तो उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है। }वे मेरी गजलें अपनी प्रेमिका को सुनाया करते थे… मुंबई में संगीतकार संदेश शांडिल्य से पहली मुलाकात का किस्सा सुनाते हुए इरशाद बोले कि उन्हें कई गजलें सुनाईं। इसके बाद कई दिनों तक फोन आता और वही गजल सुनते। आखिर एक दिन उन्होंने पूछ ही लिया कि हर बार गजल सुनकर फोन क्यों काट देते हैं। जवाब मिला कि उनका अफेयर चल रहा है और वे वही गजल अपनी प्रेमिका को सुनाते हैं। इसी के बाद उन्हें फिल्म ‘चमेली’ में चांस मिला। }मेरे गीत लोकगीतों की तरह बनें, जिन्हें हर व्यक्ति गा सके… सतिंदर सरताज ने कहा कि वे ज्यादा संगीत नहीं सुनते और न ही अपने गीत सुनने की आदत है। उनकी गाड़ी में कभी संगीत नहीं बजता। उनका मानना है कि कलाकार को अपने भीतर खाली जगह बचाकर रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश रहती है कि उनके गीत लोकगीतों की तरह बनें, जिन्हें हर व्यक्ति गा सके, अपना सके और उन पर अपना अधिकार महसूस करे।



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