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To ward off the ‘jinn of the air,’ women wear masks resembling mustaches; people consider trees their refuge.


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न्यूयॉर्क5 मिनट पहले

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अफशार बताती हैं कि कई निवासी अफ्रीकी मूल के हैं। पर यह पहचान अक्सर छिपाई जाती है। - Dainik Bhaskar

अफशार बताती हैं कि कई निवासी अफ्रीकी मूल के हैं। पर यह पहचान अक्सर छिपाई जाती है।

अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी जंग के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य चर्चा में है। लेकिन, ईरान के दक्षिणी द्वीप केश्म और होर्मुज में रहने वाले लोगों की जिंदगी और उनके जीने का अनूठा अंदाज कौतूहल पैदा करता है। खनिजों से भरपूर यहां की रेत लाल, गुलाबी, नारंगी जैसे चमकते हैं। जमीन जितनी विविधरंगी और मनमोहक है, उतने ही आकर्षक लोग, संस्कृति और पारंपरिक विश्वास-आस्था है।

ईरानी फोटोग्राफर होदा अफशार ने यहां की संस्कृति और आस्था-मान्यताओं को बखूबी बताया है। कुछ को अंधविश्वास मान सकते हैं, लेकिन यही उनका ​जीवन है..

मान्यता – कुछ भली तो कुछ हवाएं शैतानी, जिन्न वाली

ये केश्म द्वीप की रहने वाली सलिमेह हैं। उन्होंने मूंछों जैसा नकाब पहन रखा है। यह हवा की बुरी आत्माओं से बचने का जतन है। दरअसल, मान्यता है कि कुछ हवाएं शैतानी या जिन्न वाली होती हैं, जबकि कुछ भली। ‘जार’ नाम की हवा के बारे में कहा जाता है कि वह शरीर में घुस सकती है। बेचैनी या बीमारी दे सकती है। ये नकाब ‘जार’ को धोखा देने के लिए पहना जाता है।

मकसद यह कि महिला, पुरुष जैसी दिखे। मान्यता के मुताबिक महिलाएं ‘जार’ के प्रति ज्यादा असुरक्षित होती हैं। अफशार कहती हैं, ‘हवाओं से जुड़ी मान्यताओं की जड़ें पुरानी हैं। इन द्वीपों पर ईरानी, अरब, यूरोपीय ताकतों ने दावा किया। इनके तटों पर व्यापारी आए, सैनिक आए, प्रवासी आए, पूर्वी अफ्रीका, अरब प्रायद्वीप और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच आवाजाही होती रही। साथ में भाषाएं आईं। रिवाज व अनोखे विश्वास आए।’

ये नकाब ‘जार’ को धोखा देने के लिए पहना जाता है।

ये नकाब ‘जार’ को धोखा देने के लिए पहना जाता है।

शैतानी आत्माओं का डर – कुछ लोग पेड़ों पर ही रहते हैं

केश्म और होर्मुज के कुछ लोग पेड़ों पर ही रहते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि कुछ तरह के पेड़ों के नीचे सोने से शैतानी आत्मा पकड़ लेगी। यानी हवा की शक्ति व्यक्ति पर हावी हो सकती है। अफशार ने अपनी किताब ‘स्पीक द विंड’ में केश्म और होर्मुज की अनूठी मान्यताओं और आस्थाओं के बारे में बताया है। अफशार बताती हैं कि कई निवासी अफ्रीकी मूल के हैं। पर यह पहचान अक्सर छिपाई जाती है या नकारी जाती है। वजह- लंबे समय की सामाजिक श्रेणियां हैं। जर्मनी के बर्लिन में रह रहीं अफशार बताती हैं कि अब टुकड़ों में वहां की खबरें मिलती हैं। भारी सैन्य मौजूदगी। बमबारी। वह बताती हैं कि एक रिश्तेदार ने बमों के असर को ऐसे बयान किया, ‘यह भूकंप की तरह शरीर के आर-पार गुजरने जैसा लगता है। बमों-बारूदों से बचने की दुआएं करते हैं।’



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