संगठन में बदलाव से मनीष तिवारी नाराज हैं। – फाइल फोटो
पंजाब कांग्रेस को संगठनात्मक फेरबदल के बाद बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस आलाकमान की ओर से गठित की गईं चुनावी समितियों से चंडीगढ़ के मौजूदा सांसद मनीष तिवारी को बाहर रखा गया है।
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इस पर मनीष तिवारी की नाराजगी खुलकर बाहर आई है। उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोला है। मनीष तिवारी ने साफ तौर पर कहा है कि उन्होंने अपनी जिंदगी के 45 साल इस पार्टी को दिए हैं, लेकिन आज कुछ लोगों की असुरक्षा की भावना के कारण ऐसा फैसला लिया गया है।
उनके इस बयान के बाद पंजाब से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस के गलियारों में हलचल तेज हो गई है। चर्चाएं हैं कि मनीष तिवारी पार्टी छोड़ सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए पंजाब में यह बड़ा झटका होगा।
मनीष तिवारी ने सोशल मीडिया पर क्या लिखा
पार्टी की अहम कमेटियों, विशेषकर चुनाव अभियान समिति और घोषणापत्र समिति से बाहर किए जाने के तुरंत बाद मनीष तिवारी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर एक पोस्ट लिखी। उन्होंने किसी का नाम लिए बिना लिखा, “जब आपकी योग्यता दूसरों की असुरक्षा बन जाती है, तो फैसले सांगठनिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से प्रेरित होते हैं।”
तिवारी ने आगे लिखा कि उन्होंने 1981 में NSUI के एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था। छात्र राजनीति से लेकर युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री और लोकसभा सांसद बनने तक, उन्होंने साढ़े 4 दशकों तक पूरी निष्ठा के साथ सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस पार्टी की सेवा की है। ऐसे में आज उन्हें दरकिनार किए जाने का फैसला पूरी तरह से चौंकाने वाला है।
पोस्ट के अंत में उन्होंने मशहूर अंग्रेजी गीत की पंक्ति लिखी, ‘Que sera, sera, Whatever will be, will be…’, जिसका अर्थ है- जो होगा, सो होगा या जो होना है, वह होकर रहेगा।
पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी गुटबाजी फिर उजागर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मनीष तिवारी को पंजाब की चुनावी कमेटियों से दूर रखना पार्टी के भीतर चल रही गहरी गुटबाजी का नतीजा है। पंजाब कांग्रेस के कुछ शीर्ष स्थानीय नेता नहीं चाहते थे कि ट्राईसिटी (चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला) और आनंदपुर साहिब क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखने वाले तिवारी का हस्तक्षेप आगामी चुनाव के टिकट बंटवारे या चुनावी रणनीति में हो।
मनीष तिवारी को दरकिनार किए जाने के बाद उनके समर्थकों और पंजाब के कई जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी रोष देखा जा रहा है। विपक्षी दल भाजपा और आम आदमी पार्टी (AAP) भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और उन्होंने कांग्रेस को गुटबाजी से घिरी पार्टी कहना शुरू कर दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पंजाब चुनावों से ठीक पहले मनीष तिवारी जैसे नेता को चुनावी प्रक्रिया से अलग रखना कांग्रेस के लिए नुकसानदेय साबित हो सकता है।
इससे पहले भी नाराजगी जता चुके
प्रधान पद के लिए चुनाव को लेकर चल रही चर्चा के बीच मनीष तिवारी ने कहा था- पंजाब कांग्रेस के भीतर सांगठनिक स्तर या नेतृत्व (प्रधान पद) में बदलाव को लेकर चल रही किसी भी प्रक्रिया या चर्चा में कांग्रेस आलाकमान की ओर से मुझसे कोई सलाह या राय नहीं ली गई है।
उन्होंने कहा- मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि यदि आप किसी राज्य में संगठन को बदलना चाहते हैं या चुनाव की तैयारी करना चाहते हैं, तो सांगठनिक बदलाव चुनाव से कम से कम 2 साल पहले ही हो जाने चाहिए, ताकि नए नेतृत्व को जमीन पर काम करने का पर्याप्त समय मिल सके। चुनाव के बिल्कुल मुहाने पर आकर इस तरह के बड़े फैसले करने से केवल अनिश्चितता बढ़ती है।
पंजाब कांग्रेस ने संगठन में ये बदलाव किए
1 जुलाई को कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने रहेंगे। जबकि, प्रताप सिंह बाजवा विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता का दायित्व निभाते रहेंगे।
पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया है। इसके अलावा लोकसभा सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी, पूर्व मंत्री विजय इंदर सिंघला को चुनाव प्रबंधन एवं समन्वय समिति और सांसद अमर सिंह को घोषणापत्र समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया।
संगठनात्मक विस्तार के तहत सुखविंदर सिंह डैनी, राजकुमार वेरका और संगत सिंह गिलजियां को पंजाब कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। वहीं, वरिष्ठ नेता सुखपाल सिंह खैरा, राणा गुरजीत सिंह और धर्मवीर गांधी को चुनाव अभियान समिति का सह-अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
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