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चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड में 116.84 करोड़ रुपये के बहुचर्चित घोटाले में मुख्य आरोपी और स्मार्ट सिटी लिमिटेड की पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) नलिनी मलिक को सरकारी गवाह बनाने से सीबीआई ने साफ इनकार कर दिया है। सीबीआई ने विशेष अदालत में दाखिल अपने जवाब में कहा है कि नलिनी मलिक इस पूरे षड्यंत्र की अहम कड़ी रही है। उसने न केवल अन्य आरोपियों का साथ दिया, बल्कि खुद भी इस घोटाले से आर्थिक लाभ उठाया। इसलिए उसे सरकारी गवाह बनाए जाने का कोई आधार नहीं बनता। नलिनी मलिक इस समय बुड़ैल जेल में बंद है। उसने विशेष अदालत में अर्जी दाखिल कर खुद को सरकारी गवाह बनाए जाने की मांग की थी। अपनी अर्जी में उसने दावा किया था कि यदि उसे अप्रूवर बनाया जाता है तो वह स्मार्ट सिटी लिमिटेड, नगर निगम और अन्य अधिकारियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य और राज सीबीआई के सामने उजागर कर सकती है। इस अर्जी पर अदालत ने सीबीआई से जवाब मांगा था। सीबीआई ने अपने जवाब में अदालत को बताया कि जांच और दाखिल चार्जशीट में नलिनी मलिक की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी है। वह पूरे षड्यंत्र का सक्रिय हिस्सा थी और उसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। ऐसे में उसे सरकारी गवाह बनाने का सवाल ही नहीं उठता। फर्जी कंपनियां बनाकर 11 फर्जी एफडी बनाई सीबीआई के अनुसार, नलिनी मलिक ने आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के अधिकारियों के साथ मिलकर फर्जी कंपनियां बनाईं। इन कंपनियों के नाम पर 11 फर्जी फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) तैयार करवाई गईं। इसके जरिए स्मार्ट सिटी लिमिटेड के 116.84 करोड़ रुपये के सरकारी फंड को शेल कंपनियों में स्थानांतरित किया गया। बाद में इस रकम का निवेश रियल एस्टेट और सोने में किया गया। जांच एजेंसी का कहना है कि इस पूरे घोटाले के बदले नलिनी मलिक को 50 लाख रुपये नकद मिले थे। इसी रकम से उसने अपने घर में इंटीरियर डिजाइनिंग का काम भी करवाया। मुख्य आरोपियों से पूछताछ के लिए मांगी मंजूरी सीबीआई ने विशेष अदालत से आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के पूर्व ब्रांच मैनेजर रिभव ऋषि और अभय से पूछताछ की अनुमति भी मांगी है। दोनों आरोपी फिलहाल अंबाला जेल में बंद हैं। जांच एजेंसी का कहना है कि मामले की आगे की जांच के लिए दोनों से हिरासत में पूछताछ जरूरी है, ताकि घोटाले से जुड़े अन्य पहलुओं और संभावित शामिल लोगों की भूमिका का पता लगाया जा सके। सीबीआई ने अदालत में स्पष्ट किया कि नलिनी मलिक को सरकारी गवाह बनाए जाने से जांच और अभियोजन प्रभावित होगा, क्योंकि वह खुद इस आर्थिक अपराध की प्रमुख आरोपी है। एजेंसी का कहना है कि उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि उसने पूरे षड्यंत्र को अंजाम देने में सक्रिय भूमिका निभाई और उससे व्यक्तिगत आर्थिक लाभ भी प्राप्त किया। ऐसे में उसे कानून के तहत अप्रूवर बनाए जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। मामले की अगली सुनवाई में विशेष अदालत नलिनी मलिक की अर्जी पर सीबीआई के जवाब और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करेगी। स्मार्ट सिटी के 116.84 करोड़ रुपये के इस बहुचर्चित घोटाले में पहले ही कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है और मामले की जांच अभी भी जारी है।
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