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हाईकोर्ट बोला- सिर्फ एफआईआर लंबित होने से ग्रेच्युटी नहीं रुकेगी:पंजाब सरकार को निर्देश जारी, रिटायर्ड ASI को 6% ब्याज समेत ग्रेच्युटी देनी होगी




अब केवल किसी कर्मचारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने या उसके लंबित रहने के आधार पर उसकी ग्रेच्युटी नहीं रोकी जा सकेगी। यदि सक्षम अदालत में चालान (चार्जशीट) पेश नहीं हुआ है, तो कर्मचारी के सेवानिवृत्ति लाभ रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं माना जाएगा। यह फैसला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सुनाया है। जस्टिस नमित कुमार ने अपने आदेश में कहा कि सेवानिवृत्ति लाभ किसी प्रकार की कृपा या रहम नहीं, बल्कि कर्मचारी का कानूनी अधिकार हैं। किसी कर्मचारी को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना इन लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को निर्देश दिया कि रिटायर्ड एएसआई को 1 मई 2011 से 1 जनवरी 2015 तक ग्रेच्युटी के भुगतान में हुई देरी पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिया जाए। अदालत ने आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के दो महीने के भीतर पूरी प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश भी दिए। रिटायर्ड ASI ने दाखिल की याचिका मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता 28 फरवरी 2011 को पंजाब पुलिस में एएसआई के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी 5.50 लाख रुपये की ग्रेच्युटी इसलिए रोक दी गई थी क्योंकि उनके खिलाफ 19 फरवरी 2007 को मोहाली के फेज-8 थाने में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज थी। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि पुलिस ने इस मामले में 12 जुलाई 2007 को ही अदालत में कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल कर दी थी। इसके बावजूद सेवानिवृत्ति के बाद उनकी ग्रेच्युटी जारी नहीं की गई। बाद में 1 जुलाई 2014 को मोहाली की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने कैंसिलेशन रिपोर्ट स्वीकार कर ली। इसके बाद 13 अक्टूबर 2014 को ग्रेच्युटी मंजूर हुई और 1 जनवरी 2015 को भुगतान किया गया। याचिकाकर्ता ने करीब चार साल की देरी पर ब्याज देने की मांग की थी। ग्रेच्युटी जारी नहीं की जा सकती थी सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होने के कारण उसकी ग्रेच्युटी जारी नहीं की जा सकती थी। सरकार ने कहा कि नियमों के अनुसार जब तक मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक सेवानिवृत्ति लाभ रोकना उचित था। सरकार का यह भी कहना था कि जैसे ही मोहाली की अदालत ने 1 जुलाई 2014 को पुलिस की कैंसिलेशन रिपोर्ट स्वीकार की, उसके बाद विभाग ने बिना किसी अनावश्यक देरी के ग्रेच्युटी मंजूर कर दी। इसके बाद 13 अक्टूबर 2014 को ग्रेच्युटी स्वीकृत की गई और 1 जनवरी 2015 को कर्मचारी को पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया। इसलिए सरकार के अनुसार ब्याज देने का कोई आधार नहीं बनता, क्योंकि भुगतान अदालत के आदेश के बाद नियमानुसार कर दिया गया था। कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल कर चुकी पुलिस हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि कर्मचारी की ग्रेच्युटी सिर्फ इसलिए रोक दी गई थी क्योंकि उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज थी। जबकि कर्मचारी के रिटायर होने से पहले ही पुलिस इस मामले में अदालत में कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल कर चुकी थी। ऐसे में अदालत ने माना कि केवल एफआईआर लंबित होने के आधार पर ग्रेच्युटी रोकना सही नहीं था। जस्टिस नमित कुमार ने कहा कि सिर्फ एफआईआर दर्ज होना या उसका लंबित रहना, जबकि अदालत में आरोप तय भी नहीं हुए हों, सेवानिवृत्ति लाभ रोकने का आधार नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि इस मामले में सेवानिवृत्ति की तारीख तक अदालत में कैंसिलेशन रिपोर्ट लंबित थी, इसलिए ग्रेच्युटी रोकने का कोई कानूनी या उचित कारण नहीं था। पुराने फैसलों का दिया हवाला हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी आपराधिक मामले की न्यायिक कार्यवाही तब शुरू मानी जाती है, जब सक्षम अदालत में चालान या चार्जशीट पेश की जाती है। केवल एफआईआर दर्ज होना या उसका लंबित रहना कर्मचारी के सेवानिवृत्ति लाभ रोकने का आधार नहीं बन सकता।



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