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पंजाब के बेअदबी कानून के खिलाफ एक और याचिका दायर:एंग्लिकन चर्च ने लॉ को धर्म-विशेष आधारित और भेदभावपूर्ण बताया; 8 मई को सुनवाई




पंजाब सरकार द्वारा बेअदबी को लेकर बनाए गए कानून “जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026” के खिलाफ अब पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में एक और याचिका दायर की गई है। एंग्लिकन चर्च ऑफ इंडिया (CIPBC) ने इस संशोधन कानून को धर्म-विशेष आधारित, भेदभावपूर्ण और संविधान विरोधी बताया है। याचिका में कानून पर तुरंत रोक लगाने और इसे रद्द करने की मांग की गई है। अदालत में इन चार प्वाइंटों के आधार पर चुनौती दी गई है, जो कि इस प्रकार है – 1. समानता और धर्मनिरपेक्षता चर्च का तर्क है कि यह कानून केवल एक विशेष धार्मिक ग्रंथ, श्री गुरु ग्रंथ साहिब, को सुरक्षा देता है। अन्य धर्मों के पवित्र ग्रंथों को इसमें शामिल नहीं किया गया। उनका कहना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांत का उल्लंघन है। 2. सजा बहुत अधिक रखी गई है
याचिका में धारा 5(3) को चुनौती दी गई है, जिसमें शांति भंग करने के इरादे से की गई साजिश के लिए उम्रकैद का प्रावधान है। चर्च का कहना है कि गैर-हिंसक अपराध के लिए हत्या के बराबर सजा देना मनमाना और असंगत है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव
कानून में ‘बेअदबी’ की परिभाषा में बोलने, लिखने, संकेतों और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को शामिल किया गया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह परिभाषा इतनी व्यापक और अस्पष्ट है कि इससे संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। राज्य का हस्तक्षेप
चर्च ने पवित्र ग्रंथों के रख-रखाव के लिए डिजिटल रजिस्ट्री और अनिवार्य रिकॉर्ड रखने जैसे नियमों को धार्मिक मामलों में सरकार का अत्यधिक हस्तक्षेप बताया है। इस मामले में हाईकोर्ट ने याचिका पर विचार करने से पहले याचिकाकर्ता की साख की जांच करने का निर्णय लिया है। मामले की अगली सुनवाई अब 8 मई, 2026 को तय की गई है।

अब तक दो याचिकाएं हो चुकी है दाखिल इस मामले में अब तक 2 याचिकाएं दाखिल हो चुकी है। सिमरनजीत सिंह की जनहित याचिका (PIL) इस कानून के खिलाफ दायर पहली प्रमुख याचिका थी। जालंधर निवासी याचिकाकर्ता ने कानून को समानता के अधिकार और संवैधानिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी थी। वहीं, एंग्लिकन चर्च ऑफ इंडिया की ओर से भी हाल ही में नई याचिका दायर की गई है। इसमें इस कानून को धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के विपरीत बताया गया है।



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