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स्मार्टफोन, टैबलेट और टीवी बच्चों के बचपन और मानसिक विकास के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। पीजीआईएमईआर (PGIMER) चंडीगढ़ की विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कम उम्र में बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता, भाषा विकास और सामाजिक व्यवहार को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। पीजीआई के पीडियाट्रिक्स एंड सोशल पीडियाट्रिक्स विभाग की प्रो. डॉ. भवनीत भारती ने बच्चों में बढ़ते स्क्रीन एक्सपोजर को लेकर चिंता जताई। डॉ. भारती ने कहा कि खेल बच्चों के विकास का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। खेलते हुए बच्चे बोलना, समझना, कल्पना करना, समस्याओं का समाधान निकालना और सामाजिक व्यवहार सीखते हैं। लेकिन बढ़ता स्क्रीन टाइम उनके प्राकृतिक विकास को प्रभावित कर रहा है। रिसर्च के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता डॉ. भवनीत भारती ने इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स-2026 में प्रकाशित एक हालिया शोध का हवाला देते हुए बताया कि 18 से 24 महीने की उम्र के बच्चों पर किए गए अध्ययन में कई चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार करीब 68 प्रतिशत बच्चे 18 महीने की उम्र से पहले ही स्मार्टफोन, टीवी या अन्य डिजिटल स्क्रीन के संपर्क में आ चुके हैं। वहीं लगभग 33 प्रतिशत बच्चे सप्ताह के सामान्य दिनों में भी प्रतिदिन एक घंटे से अधिक समय स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह उम्र बच्चों के मस्तिष्क विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवधि होती है। ऐसे समय में स्क्रीन पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में कई व्यवहारिक और विकास संबंधी समस्याओं को जन्म दे सकती है। बच्चों के विकास पर पड़ रहा सीधा असर अध्ययन में पाया गया कि अधिक स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में कई महत्वपूर्ण विकासात्मक क्षमताएं प्रभावित हो रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार स्क्रीन केवल एकतरफा संवाद का माध्यम है। बच्चे स्क्रीन देखते तो हैं, लेकिन बातचीत नहीं करते। इससे बोलने और भाषा समझने की क्षमता प्रभावित होती है। रिसर्च में पाया गया कि जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम अधिक था, उनमें समस्या समाधान और तार्किक सोच विकसित होने की गति अपेक्षाकृत कम थी। लगातार स्क्रीन देखने वाले बच्चों में एकाग्रता की कमी, चिड़चिड़ापन और बेचैनी जैसी समस्याएं अधिक देखी गईं। स्क्रीन के कारण बच्चों की शारीरिक गतिविधियां कम हो रही हैं। इससे चलने, दौड़ने, संतुलन बनाने और मोटर स्किल्स के विकास पर असर पड़ रहा है। बच्चों की नींद प्रभावित डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक स्क्रीन देखने से बच्चों की नींद प्रभावित होती है। साथ ही आउटडोर गतिविधियां कम होने से मोटापे का खतरा भी बढ़ जाता है। स्क्रीन के अधिक उपयोग से बच्चे परिवार और दोस्तों के साथ कम समय बिताते हैं। इससे सामाजिक व्यवहार और भावनात्मक विकास प्रभावित हो सकता है। कम स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में बेहतर विकास शोध में यह भी सामने आया कि जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम प्रतिदिन एक घंटे या उससे कम था, उनकी कम्युनिकेशन स्किल्स, सामाजिक व्यवहार और समस्या समाधान क्षमता अपेक्षाकृत बेहतर थी। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को स्क्रीन की बजाय वास्तविक दुनिया के अनुभव, पारिवारिक संवाद और खेलकूद से ज्यादा सीखने का अवसर मिलता है।
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1 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के लिए नुकसानदायक:चंडीगढ़ PGI का रिसर्च के हवाले से दावा; 18 महीने से छोटे 68% बच्चे शिकार







