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हाईकोर्ट बोला, बेवजह मुकदमेबाजी से अदालतों पर बढ़ रहा बोझ:₹16,890 के लिए 14 साल चला केस, बुजुर्ग कर्मचारी को कोर्ट में घसीटने पर उठाए सवाल




पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक छोटे से मामले में सरकार की लंबी मुकदमेबाजी पर कड़ी नाराजगी जताई है। मामला सिर्फ ₹16,890 की रिकवरी का था, लेकिन इसे लेकर करीब 14 साल तक केस चलता रहा। कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था का मकसद लोगों को राहत देना है, न कि उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान करना। दरअसल, यह मामला एक सेवानिवृत्त कर्मचारी से जुड़ा है। कर्मचारी को 1999 में 24 साल की सेवा पूरी करने पर एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (ACP) का लाभ मिला था। लेकिन अक्टूबर 2007 में रिटायरमेंट के कुछ समय बाद ही यह लाभ वापस ले लिया गया। इसके बाद उसका वेतन घटा दिया गया और रिटायरमेंट के पैसों से ₹16,890 की रिकवरी कर ली गई। इससे परेशान होकर कर्मचारी ने पंजाब रोडवेज वर्कर्स यूनियन के जरिए औद्योगिक विवाद उठाया। मामले की सुनवाई करने वाले ट्रिब्यूनल ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला देते हुए रिकवरी को गलत ठहराया और रकम वापस करने के आदेश दिए। सरकार ने ट्रिब्यूनल के फैसले को दी चुनौती आम तौर पर ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद इस विवाद का यहीं अंत हो जाना चाहिए था, क्योंकि आदेश साफ था कि कर्मचारी से की गई रिकवरी गलत है और उसे राशि वापस की जाए। लेकिन इसके उलट राज्य सरकार ने इस फैसले को मानने के बजाय इसे चुनौती देने का फैसला लिया। सरकार ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करवाने की मांग की। इसके बाद मामला कानूनी प्रक्रिया में उलझता चला गया। सुनवाई की तारीखें पड़ती रहीं, विभागों से जवाब मांगे जाते रहे और फाइलें अलग-अलग स्तरों पर घूमती रहीं। इस दौरान न तो कर्मचारी को पूरी राहत मिल सकी और न ही विवाद खत्म हुआ। केस कई सालों तक लंबित रहा, जिसमें सरकारी विभागों, वकीलों और अधिकारियों की ओर से बार-बार पेशियां होती रहीं। इस लंबी प्रक्रिया के कारण एक छोटी सी राशि का मामला भी बड़ा कानूनी विवाद बन गया। वहीं, दूसरी तरफ बुजुर्ग कर्मचारी को भी बार-बार कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े, जिससे उसे मानसिक और आर्थिक दोनों तरह की परेशानी झेलनी पड़ी। करीब 14 साल तक मामला हाई कोर्ट में चलता रहा, जबकि इसमें कोई जटिल कानूनी सवाल भी नहीं था। यही वजह रही कि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाया और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। हाई कोर्ट ने जताई नाराजगी सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हैरानी की बात है कि राज्य 2012 से इतनी छोटी रकम के लिए केस लड़ रहा है, जबकि कर्मचारी अब करीब 75 साल का हो चुका है। कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ रकम का मामला नहीं, बल्कि समझदारी और संतुलन का मुद्दा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के केस सरकार की मुकदमेबाजी प्रणाली की खामियों को दिखाते हैं। पंजाब की नीति के अनुसार छोटे मामलों और व्यक्तिगत विवादों में अपील से बचना चाहिए, लेकिन फिर भी यह मामला कई स्तरों से गुजरते हुए हाई कोर्ट तक पहुंच गया। अनावश्यक मुकदमों से बचने की जरूरत कोर्ट ने इस दौरान साफ किया कि कई विकसित देशों में सरकारों के लिए मुकदमेबाजी को लेकर स्पष्ट और सख्त मानक तय हैं। जैसे यूके, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में सरकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह “मॉडल लिटिगेंट” के रूप में काम करे। इसका मतलब है कि सरकार केवल जरूरी और उचित मामलों में ही कोर्ट जाए, न कि हर छोटे विवाद को कानूनी लड़ाई बना दे। कोर्ट ने कहा कि “मॉडल लिटिगेंट” होने का अर्थ है निष्पक्षता, जिम्मेदारी और समझदारी के साथ फैसले लेना। सरकार को यह देखना चाहिए कि क्या मामला वास्तव में अदालत तक ले जाने लायक है या उसे प्रशासनिक स्तर पर ही सुलझाया जा सकता है। खासकर छोटे आर्थिक विवादों या व्यक्तिगत मामलों में अनावश्यक अपील से बचना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह की सोच न सिर्फ लोगों को बेवजह की परेशानी से बचाती है, बल्कि न्यायालयों पर बढ़ते बोझ को भी कम करती है। सरकार ने वापस ली याचिका कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद राज्य सरकार ने अपनी याचिका वापस ले ली। हालांकि, उसने यह मांग की कि ट्रिब्यूनल का फैसला भविष्य में मिसाल न बने। कोर्ट ने यह बात मान ली और साफ कर दिया कि इस फैसले का फायदा अन्य कर्मचारियों को नहीं मिलेगा। हाई कोर्ट में पहले ही लंबित हैं लाखों केस कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि हाई कोर्ट में पहले से ही 4 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं, जिनमें कई ऐसे केस हैं जिनमें लोगों को वर्षों से न्याय का इंतजार है। ऐसे हालात में जब सरकार छोटी-छोटी बातों पर भी अपील करती है, तो इससे न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है और जरूरी मामलों की सुनवाई में देरी होती है। अदालत ने कहा कि हर केस को हाई कोर्ट तक ले जाना जरूरी नहीं होता। सरकार को यह समझना चाहिए कि किन मामलों में अपील करनी चाहिए और किन्हें वहीं समाप्त कर देना बेहतर है। अगर बिना ठोस कारण के हर फैसले को चुनौती दी जाएगी, तो इससे अदालतों का समय और संसाधन दोनों बर्बाद होंगे। कोर्ट ने सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार को “विवाद के लिए विवाद” करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए और जिम्मेदारी के साथ मुकदमेबाजी करनी चाहिए, ताकि आम लोगों को समय पर न्याय मिल सके।



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