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हाईकोर्ट बोला कनाडा गए व्यक्ति को भगोड़ा नहीं ठहरा सकते:2015 में दर्ज FIR, धारा-82 की प्रक्रिया का पालन जरूरी,समझौते की जानकारी अदालत को दी




पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि यदि कोई व्यक्ति पहले ही विदेश, विशेषकर कनाडा, जा चुका है तो उसे भारत में उसके पुराने पते पर नोटिस भेजकर भगोड़ा घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करने से पहले कानून में तय पूरी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। यौन उत्पीड़न और आईटी एक्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रोहित कपूर की पीठ ने नकोदर की अदालत द्वारा 12 जनवरी 2018 को पारित भगोड़ा घोषित करने के आदेश को रद्द कर दिया। 2015 में दर्ज हुई थी एफआईआर मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ 8 मई 2015 को जालंधर के नकोदर थाने में आईटी एक्ट की धारा 66-ई और 67-ए तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 354-ए के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि एफआईआर दर्ज होने के समय वह नाबालिग के करीब उम्र का था और उसे अग्रिम जमानत मिल चुकी थी। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसके पिता पहले से कनाडा में रहते थे और उन्होंने उसे स्पॉन्सर किया था। इसके बाद वह 9 अगस्त 2017 को भारत छोड़कर कनाडा चला गया। उसका कहना था कि उसे लगा था कि उसके खिलाफ दर्ज मामला समाप्त हो चुका है। बाद में जब उसकी मां भारत आईं, तब परिवार को पता चला कि उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया है। धारा-82 की प्रक्रिया का पालन जरूरी याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जब अदालत की ओर से उद्घोषणा (प्रोक्लेमेशन) जारी की गई, उस समय वह भारत में अपने पुराने पते पर मौजूद ही नहीं था। इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा-82 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का सही तरीके से पालन नहीं हुआ। उसने अपने पासपोर्ट के जरिए भी यह साबित किया कि वह उस समय कनाडा में था। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि निचली अदालत ने अपने आदेश में यह नहीं बताया कि वह जानबूझकर फरार था या गिरफ्तारी से बचने के लिए छिपा हुआ था। समझौते की जानकारी अदालत को दी सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट को बताया गया कि दोनों पक्षों के बीच 6 दिसंबर 2025 को समझौता हो चुका है। एफआईआर रद्द कराने के लिए अलग से याचिका भी दायर की गई है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब अदालत ने उद्घोषणा जारी की थी, उस समय याचिकाकर्ता अपने पुराने पते पर नहीं था, क्योंकि वह कनाडा जा चुका था। ऐसे में उसे भगोड़ा घोषित करना सही नहीं था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने नकोदर अदालत का आदेश रद्द कर दिया।



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