पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही और आपराधिक मामलों की जांच को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि केवल संदेह, अनुमान या अटकलों के आधार पर किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी या कार्रवाई नहीं की जा सकती। किसी अधिकारी पर जिम्मेदारी तय करने के लिए उसके खिलाफ जानबूझकर किए गए कदाचार या कर्तव्य में लापरवाही के स्पष्ट और ठोस साक्ष्य होना जरूरी है। जस्टिस नीरजा कुलसन की एकल पीठ ने 2016 के रोहतक दुष्कर्म मामले में आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए उसे संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। इसके साथ ही जांच से जुड़े पुलिस अधिकारियों की ओर से दायर 3 याचिकाएं भी मंजूर कर लीं और ट्रायल कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों को रद कर दिया। 2016 के रेप केस से जुड़ा है मामला मामला 23-24 सितंबर 2016 की रात दर्ज हुई एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें एक महिला ने अपहरण और दुष्कर्म के आरोप लगाए थे। रोहतक की अतिरिक्त सत्र अदालत ने सितंबर 2018 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाकर उनके खिलाफ कार्रवाई के निर्देश भी दिए थे। हाईकोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई के दौरान साक्ष्यों का परीक्षण किया और पाया कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में गंभीर विसंगतियां हैं। अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। कानून शक नहीं, ठोस सबूत मांगता है फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में अदालतों को पीड़ित के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, लेकिन आरोपी को भी संविधान के तहत समान सुरक्षा प्राप्त है। किसी व्यक्ति को केवल संभावना, अनुमान या कमजोर साक्ष्यों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कानून का शासन ठोस और विश्वसनीय प्रमाण की मांग करता है। पुलिस अधिकारियों को भी मिली राहत हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की ओर से पुलिस अधिकारियों के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियां और कार्रवाई के निर्देश निरस्त कर दिए। अदालत ने कहा कि किसी भी सरकारी अधिकारी की प्रतिष्ठा और सेवा जीवन को प्रभावित करने वाला आदेश पारित करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। चालान पेश होने से पहले ही तबादला अफसरों का तबादला कोर्ट ने यह भी पाया कि संबंधित अधिकारियों का चालान पेश होने से पहले ही तबादला हो चुका था और जांच में कथित कमियों के लिए उनकी सीधी जिम्मेदारी का कोई ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था। इसके अलावा ट्रायल कोर्ट के आदेश पर दर्ज एफआईआर की स्वतंत्र जांच में भी मिलीभगत या हेरफेर का कोई प्रमाण नहीं मिला और जांच एजेंसी पहले ही क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर चुकी है।
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