चंडीगढ़ | हाईकोर्ट ने एनडीपीएस मामलों में वाहन मालिकों और सह आरोपियों को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है। जस्टिस मनीषा बत्रा ने स्पष्ट किया है कि यदि मुख्य आरोपी बरी हो गया है तो इसका मतलब यह नहीं है कि सह आरोपी या वाहन मालिक के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही खुद ब खुद समाप्त हो जाएगी। कपूरथला निवासी रानी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर 2018 की एक एफआईआर और पूरक चालान को रद्द करने की मांग की थी। मामला 17 अक्टूबर 2018 का है, जिसमें मुख्य आरोपी राकेश कुमार उर्फ केशा के पास से मादक पदार्थ बरामद हुआ था। याचिकाकर्ता का नाम मूल एफआईआर में नहीं था लेकिन बाद में पुलिस ने उसे गाड़ी की मालिक होने के नाते एनडीपीएस एक्ट की धारा 25 के तहत आरोपी बनाया।याचिकाकर्ता का तर्क था कि मुख्य आरोपी 2020 में बरी हो चुका है इसलिए अब उस पर मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। उसके पास से कोई स्वतंत्र साक्ष्य भी बरामद नहीं हुआ है। साक्ष्यों का मूल्यांकन ट्रायल कोर्ट करेगा हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट मिनी ट्रायल नहीं कर सकता और न ही सबूतों को तौल सकता है। सिर्फ इस आधार पर कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती कि मुख्य आरोपी बरी हो गया है। गाड़ी के उपयोग के बारे में मालिक को जानकारी थी या सहमति, इसका फैसला सबूतों के आधार पर सिर्फ ट्रायल कोर्ट ही करेगा। हाईकोर्ट केवल अत्यंत सीमित परिस्थितियों में ही कार्यवाही रद्द कर सकता है, हर मामले में नहीं।
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मुख्यारोपी बरी होने से सह आरोपी को नहीं मिलेगी क्लीन चिट: कोर्ट







