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प्रॉपर्टी टैक्स : फिर 53 चेक बाउंस, निगम के




शुभेंदु शुक्ला | अमृतसर नगर निगम के प्रॉपर्टी टैक्स विभाग में रिकवरी के नाम पर बकायेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत का एक बड़ा खेल चल रहा है। ताजा मामले में 5 जोनों से रिकवरी के रूप में लिए गए 53 चेक बैंक में बाउंस हो गए हैं, जिससे निगम के 30,55,345 रुपए फंस गए हैं। विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं क्योंकि यह चूक कोई पहली बार नहीं है बल्कि एक सिलसिला बन चुका है। चेक जमा करते वक्त काउंटर पर बुनियादी जांच करना तक जरूरी नहीं समझा जा रहा है। बता दें कि दैनिक भास्कर ने 20 मई 2026 को प्रमुखता से प्रकाशित किया था कि 51 चेक बाउंस होने से निगम के 35.57 लाख रुपए अटक गए हैं। उस सूची में सबसे ज्यादा 26 बकाएदार ऐसे थे जिनके खाते में पर्याप्त बैलेंस ही नहीं था। इससे पहले अप्रैल 2026 में भी 30 चेक (13.42 लाख रुपए) बाउंस हुए थे। काउंटर पर चेक लेते समय जांच की जाती तो गड़बड़ी पकड़ी जा सकती थी लेकिन विभाग ने कोई सबक नहीं लिया। अब जुलाई में 53 नए बाउंस चेकों की सूची यह साबित करती है कि यह महज कोई लापरवाही नहीं बल्कि जानबूझकर ऐसे मामलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। चेक बाउंस होना कोई सामान्य गलती नहीं है बल्कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत यह एक आपराधिक मामला है। जिसमें 2 साल तक की सजा या जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन विभाग की कार्रवाई बकायेदारों को रिकवरी नोटिस भेजने तक ही सीमित है। प्रॉपर्टी टैक्स न देने पर निगम के पास प्रॉपर्टी सील करने का अधिकार होता है। जिन बकायेदारों के चेक बार-बार रद्दी साबित हो रहे हैं, उनकी संपत्तियों को अटैच या सील करने की कार्रवाई अब तक क्यों शुरू नहीं की गई? क्या बड़े रसूखदारों को बचाने के लिए यह पूरा खेल रचा जा रहा है? अगर यह पैसा निगम के बैंक खाते में समय पर आ जाता, तो इस पर ब्याज मिलता। बकायेदारों और अफसरों की इस मिलीभगत से न सिर्फ मूल रकम फंसी है, बल्कि शहर के विकास के लिए इस्तेमाल होने वाले ब्याज के पैसों का भी सीधा नुकसान हुआ है। अपर्याप्त बैलेंस (25 मामले): बकायेदारों ने निगम को चेक काट कर दे दिए, जबकि उनके खाते में पैसे ही नहीं थे। गलत हस्ताक्षर (7 मामले): बकायेदारों के हस्ताक्षर उनके बैंक रिकॉर्ड से मेल ही नहीं खाए। गलत साइन किए। पेमेंट रुकवाना (6 मामले): बकायेदारों ने चेक देकर बैंक से खुद पेमेंट रुकवा दी। बिना तारीख के चेक (4 मामले): काउंटर क्लर्क की घोर लापरवाही। बिना तारीख देखे (अनडेटेड/पोस्टडेटेड) ही चेक स्वीकार कर लिए गए। अकाउंट बंद या ब्लॉक (3 मामले): बकायेदारों के बैंक अकाउंट बंद हो चुके थे, फिर भी उनके चेक बेखौफ ले लिए गए।



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