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नारनौल में बेटी का शादी से पूर्व निकाला बनवारा:पंचकूला में लगा क्लर्क आज लाएगा बारात, लड़की भी सरकारी नौकरी में




हरियाणा के नारनौल में गांव धौलेड़ा में एक पिता ने अपनी बेटी की शादी को खास बनाते हुए सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने की मिसाल पेश की। सरकारी टीचर जुगजीत ने अपनी बेटी प्रियंका की शादी में परंपराओं से हटकर “बनवारा” घोड़ी पर बैठाकर निकाला। प्रियंका की शादी आज होगी। उसकी बारात गांव पड़तल से आएगी। शादी की सभी रस्में निभाई जा रही हैं। इसी तरह बनवारे की रस्म भी हुई। जिसके तहत रविवार रात को शादी से एक दिन पूर्व प्रियंका को घोड़ी पर बैठाकर गांव में बनवारा निकाला। महिलाओं ने गाए गीत बनवारे के अवसर पर महिलाओं ने शादी में गाए जाने वाले मंगल गीत गाए तथा नाच गाकर खुशियां मनाई गई। बनवारे में आस पड़ोस, परिचित के अलावा रिश्तेदारों ने भी भाग लिया। इससे पूर्व सहभोज का भी आयोजन किया गया। कृषि विभाग का क्लर्क लाएगा बारात प्रियंका की शादी महेंद्रगढ़ के पड़तल भोजावास निवासी मनीष के साथ होगी। मनीष पंचकूला में कृषि विभाग में क्लर्क लगा हुआ है। वह आज अपने परिजनों, रिश्तेदारों व परिचितों के साथ शादी के लिए बारात लेकर आएगा। बेटों के लिए होती है यह रस्म ग्रामीण नरेंद्र, राकेश व सतीश ने बताया कि आमतौर पर यह रस्म बेटों के लिए ही देखी जाती है, लेकिन जुगजीत ने यह साबित कर दिया कि बेटियां भी किसी मायने में कम नहीं हैं। आज के दौर में बेटियां हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं। चाहे घर की जिम्मेदारियां हों, नौकरी, व्यापार या फिर देश की सेवा। बना चर्चा का विषय इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए जुगजीत ने अपनी बेटी को भी वही सम्मान दिया, जो समाज में अक्सर बेटों को मिलता है। गांव में जब प्रियंका घोड़ी पर सवार होकर निकली, तो यह दृश्य लोगों के लिए आकर्षण और चर्चा का केंद्र बन गया। कई लोगों ने इसे एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत बताया। नहीं किया कभी भेदभाव
जुगजीत ने बताया कि उन्होंने कभी भी बेटे और बेटी में भेदभाव नहीं किया। उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी है। बेटा दिल्ली पुलिस में कार्यरत है, जबकि बेटी प्रियंका भी सरकारी नौकरी कर रही है। उन्होंने कहा कि हर पिता का सपना होता है कि वह अपनी बेटी की हर इच्छा पूरी करे और उसे जीवन में आगे बढ़ने का पूरा अवसर दे। समाज की बदल रही सोच
यह पहल न केवल एक पिता के समानता के विचारों को दर्शाती है, बल्कि समाज के लिए भी एक प्रेरणादायक संदेश है। इसने यह साबित कर दिया कि अगर सोच बदले, तो परंपराएं भी बदल सकती हैं। बेटियों को बराबरी का अधिकार और सम्मान देना ही एक सशक्त और प्रगतिशील समाज की पहचान है।



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