शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी यानी एसजीपीसी की विशेष जनरल सभा आज अमृतसर स्थित तेजा सिंह समुंदरी हॉल में आयोजित की गई। बैठक में श्री अकाल तख्त साहिब द्वारा पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के संबंध में जारी आदेश का समर्थन करते हुए उसे संगत तक पहुंचाने का फैसला लिया गया। इसी क्रम में एक और प्रस्ताव में कहा गया कि मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान पर सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर कथित तौर पर झूठे सबूत तैयार कराने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने जैसे आरोपों के संबंध में कानूनी कार्रवाई की जाए। इसके लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की अंतरिम कमेटी का एक प्रतिनिधिमंडल पंजाब के डीजीपी से मुलाकात करेगा और मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान तथा उनके सहयोगियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उचित कानूनी कार्रवाई की मांग करेगा। इस के साथ 5 जुलाई 2026 को गुरुद्वारा श्री मंजी साहिब दीवान हॉल में पारंपरिक रीति के अनुसार एक विशाल पंथक एकत्र बुलाने की घोषणा की गई। एसजीपीसी अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में विभिन्न तख्तों के जत्थेदारों, श्री हरिमंदिर साहिब के ग्रंथियों, एसजीपीसी पदाधिकारियों और बड़ी संख्या में सदस्यों ने भाग लिया। सभा में यह निर्णय भी लिया गया कि प्रत्येक क्षेत्र में विशेष प्रचार अभियान चलाकर संगत को श्री अकाल तख्त साहिब के आदेशों के प्रति जागरूक किया जाएगा। श्री अकाल तख्त साहिब के कार्यकारी जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज ने अपने संबोधन में कहा कि श्री अकाल तख्त साहिब सिख पंथ की सर्वोच्च संस्था है और उसके आदेशों का पालन करना प्रत्येक सिख का कर्तव्य है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारें लगातार सिख संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने खालसा पंथ से एकजुट होकर ऐसी कोशिशों का लोकतांत्रिक ढंग से मुकाबला करने का आह्वान किया। वहीं एसजीपीसी अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने कहा कि सिख संस्थाओं के सम्मान और श्री अकाल तख्त साहिब की सर्वोच्चता को बनाए रखना शिरोमणि कमेटी की जिम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि 5 जुलाई को होने वाले पंथक एकत्र में सभी सिख संप्रदायों, धार्मिक संस्थाओं, जत्थेबंदियों और संगतों को आमंत्रित किया जाएगा। एक अन्य प्रस्ताव में महाराष्ट्र सरकार द्वारा तख्त श्री हजूर साहिब से जुड़े वर्ष 1956 के अधिनियम में प्रस्तावित बदलावों पर भी कड़ा विरोध दर्ज कराया गया। एसजीपीसी ने कहा कि सिख धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता और पारंपरिक व्यवस्थाओं में किसी भी प्रकार का सरकारी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा तथा सरकार से प्रस्तावित संशोधनों पर पुनर्विचार करने की मांग की गई।
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