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जाट-झोट्‌टा जहां मिलेगा, वहीं लट्‌ठ मारुंगा‘ मामले में जमानत खारिज:एसई गीतू राम तंवर मामले में सोनीपत कोर्ट में सुनवाई; आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में अदालत सख्त




सोनीपत में एक वायरल वीडियो में कथित रूप से आपत्तिजनक और भड़काऊ बयान देने के मामले में आज सोनीपत कोर्ट में सुनवाई की गई।
अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (UHBVNL) के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर (SE) गीतू राम तंवर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि एक जिम्मेदार सार्वजनिक पद पर बैठे अधिकारी द्वारा दिए गए ऐसे बयान समाज में शांति और साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं, इसलिए जांच एजेंसी को निष्पक्ष और बिना किसी दबाव के काम करने देना जरूरी है।
एफआईआर और आरोपों की पूरी पृष्ठभूमि
यह मामला 10 अप्रैल 2026 को दर्ज एफआईआर से जुड़ा है, जो सिटी थाना सोनीपत में एक अधिवक्ता की शिकायत पर दर्ज की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि गीतू राम तंवर ने एक वीडियो में एक विशेष समुदाय के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक, अपमानजनक और भड़काऊ टिप्पणी की, जिससे विभिन्न समुदायों के बीच नफरत और वैमनस्य फैल सकता है।
एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1) सहित अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि आरोपी का बयान कानून-व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ सकता है और क्षेत्र में तनाव पैदा कर सकता है।
वायरल वीडियो बना केस का आधार
मामले की सबसे अहम कड़ी एक वायरल वीडियो है, जिसे सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया गया। आरोप है कि इस वीडियो में गीतू राम तंवर एक विशेष समुदाय को निशाना बनाते हुए कहते नजर आ रहे हैं—“जाट या झोटा जहां भी मिलेंगे, लाठ मारूंगा।”
अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि वीडियो में इस्तेमाल की गई भाषा न केवल आपत्तिजनक है बल्कि उसका स्वर और प्रस्तुति भी अत्यंत उग्र और अशोभनीय है, जिससे समाज में तनाव उत्पन्न हो सकता है।
याचिकाकर्ता का बचाव: बयान को बताया संदर्भ से बाहर
अग्रिम जमानत की मांग करते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में दलील दी कि पूरे बयान को संदर्भ से काटकर पेश किया गया है। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की विश्वसनीयता संदिग्ध है और उसके स्रोत की जांच अभी बाकी है।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी का किसी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने का कोई इरादा नहीं था और वह जांच में पूरा सहयोग करेगा। साथ ही यह भी कहा गया कि आरोपी का सेवा रिकॉर्ड साफ-सुथरा है और उसे हिरासत में लेकर पूछताछ करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
सरकारी वकील का विरोध: गंभीर और व्यापक आरोप
वहीं सरकारी वकील और शिकायतकर्ता पक्ष ने जमानत का जोरदार विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि आरोपी पहले भी भ्रष्टाचार के मामलों में नामजद रहा है, जिससे उसका “बेदाग सेवा रिकॉर्ड” होने का दावा कमजोर पड़ता है।
इसके अलावा आरोपी पर अपने पद का दुरुपयोग करने, अधीनस्थ अधिकारियों को धमकाने और प्रभाव का गलत इस्तेमाल करने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए। अदालत को यह भी बताया गया कि आरोपी ने हाई कोर्ट से मिले राहत आदेश के बाद भी अनुचित तरीके से उसका श्रेय लेने की कोशिश की, जिसकी शिकायत संबंधित प्राधिकरण को दी जा चुकी है।
अदालत की टिप्पणी: सार्वजनिक पद पर जिम्मेदारी अधिक
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि एक सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की जिम्मेदारी आम नागरिक से कहीं अधिक होती है। ऐसे व्यक्ति के बयान का प्रभाव व्यापक होता है और वह समाज में सकारात्मक या नकारात्मक दोनों तरह का असर डाल सकता है।
अदालत ने कहा कि आरोपी के कथित बयान स्पष्ट, सीधे और लक्षित हैं, जो प्रथम दृष्टया कानून के दायरे में अपराध की श्रेणी में आते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि सामाजिक सौहार्द एक नाजुक संतुलन है, जिसे बिगाड़ना आसान लेकिन बहाल करना बेहद कठिन होता है।
जांच प्रभावित होने की आशंका
अदालत ने यह भी माना कि आरोपी अपने पद और प्रभाव के चलते गवाहों को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा अधीनस्थ कर्मचारियों को धमकाने के आरोपों की भी जांच आवश्यक है।
कोर्ट ने कहा कि मामले की जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और ऐसे में आरोपी को अग्रिम जमानत देना जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी उल्लेख
सरकारी पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों का हवाला भी दिया, जिनमें नफरत फैलाने वाले भाषणों पर सख्त कार्रवाई करने और पुलिस को स्वतः संज्ञान लेने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने इन दलीलों को भी गंभीरता से लिया।
अंतिम फैसला: अग्रिम जमानत से इनकार
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद अदालत ने कहा कि यह मामला गंभीर प्रकृति का है और आरोपी एक जिम्मेदार सरकारी पद पर है, इसलिए उसे राहत देना उचित नहीं होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी किए, इस स्तर पर अग्रिम जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता। इसी के साथ गीतू राम तंवर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई।



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