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पंजाब में नशे की चपेट में आने 65 % लोग 18 से 35 साल की उम्र के हैं। जेल में OOAT क्लीनिक में 4 साल में 40,830 कैदी पहुंचे। लेकिन सबसे चौकाने वाली बात है कि जेलों में नशा मुक्ति के लिए दी जाने वाली बुप्रेनॉर्फिन गोलियों की खपत 8 गुना बढ़ गई है। कमेटी के मेंबर ने विधानसभा में रिपोर्ट पेश करते समय इस पर चिंता जताई है। कमेटी के चेयरमैन विधायक जगरूप सिंह ने बताया कि 2022 में जेलों में बुप्रेनॉर्फिन की 1 करोड़ 17 लाख 94 हजार 71 गोलियां वितरित की गई थीं, जबकि 2026 में यह संख्या बढ़कर 8 करोड़ 87 लाख 9 हजार 627 हो गई। यानी चार वर्षों में इन गोलियों की खपत करीब आठ गुना बढ़ गई है। विधायक ने कहा कि जेलों में कैदियों की संख्या में इतना बड़ा बदलाव नहीं हुआ, फिर भी दवाओं की खपत कई गुना बढ़ना गंभीर संकेत है। सरकार को इसकी वजह पता लगानी चाहिए। उन्होंने आशंका जताई कि कहीं ऐसा न हो कि नशा छुड़ाने के लिए दी जा रही दवाओं पर ही युवा निर्भर होने लगे हो। उन्होंने कहा कि यह मामला जेलों के भीतर की स्थिति पर भी कई सवाल खड़े करता है। सेहत मंत्री ने बताई खपत बढ़ने की वजह स्वास्थ्य मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने कहा कि जेलों में बुप्रेनॉर्फिन गोलियों की खपत बढ़ने की वजह सरकार की नई उपचार नीति है, न कि नशे में बढ़ोतरी। उन्होंने कहा कि पहले जेलों में नशा मुक्ति की दवाओं की तस्करी और दुरुपयोग की शिकायतें मिलती थीं। कई नशा पीड़ितों को बिना समुचित उपचार के भेज दिया जाता था, जिससे उनकी वास्तविक नशामुक्ति नहीं हो पाती थी। स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि सरकार ने जेलों में OOAT क्लीनिक और विशेष वार्ड बनाए हैं। वहां काउंसलर, डॉक्टर और अन्य स्टाफ तैनात किया गया है, ताकि कैदी जेल से बाहर निकलते समय नशामुक्त होकर समाज में लौटें। उन्होंने कहा कि पहले कई मरीजों इंजेक्शन लेते थे। अब उन्हें अब गोलियों पर लेकर आए है। पहले दवाईयों के दुरुपयोग की आशंका रहती थी। अब सरकार उन्हें बुप्रेनॉर्फिन गोलियों पर शिफ्ट कर रही है। इसी वजह से गोलियों की खपत बढ़ी है, जबकि इसका उद्देश्य दवाओं के दुरुपयोग को रोकना और बेहतर इलाज उपलब्ध कराना है मरीज पहुंच रहे 250, बेड 15 उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के करीब 65% युवा किसी न किसी रूप में नशे से प्रभावित हैं। नशा मुक्ति केंद्रों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन सुविधाएं बेहद सीमित हैं। उदाहरण के तौर पर लुधियाना सिविल अस्पताल में प्रतिदिन 250 से अधिक मरीज पहुंचते हैं, जबकि नशा मुक्ति वार्ड में सिर्फ 15 बेड उपलब्ध हैं। समिति ने यह भी सवाल उठाया कि नशा छुड़ाने में इस्तेमाल होने वाली बुप्रेनॉर्फिन दवा की खरीद 2022 में 7 करोड़ से बढ़कर 2025 में 11 करोड़ तक पहुंच गई, लेकिन लंबे समय से दवा लेने वाले मरीजों की वास्तविक नशामुक्ति का आकलन नहीं हो रहा। बिना लाइसेंस और उचित स्टाफ के नशा मुक्ति केंद्र रिपोर्ट में अमृतसर समेत कई जिलों में बिना लाइसेंस, बिना प्रशिक्षित स्टाफ और बिना डॉक्टरों के चल रहे अवैध नशा मुक्ति केंद्रों पर भी चिंता जताई गई है। कई केंद्र रिहायशी मकानों में संचालित हो रहे हैं। 28 अस्पतालों की इमारतें जर्जर पंजाब हेल्थ सिस्टम्स कॉरपोरेशन (PHSC) के अधीन आने वाली 226 स्वास्थ्य संस्थाओं में से 28 इमारतें अत्यंत जर्जर और असुरक्षित पाई गई हैं। इनमें मोहाली जिला अस्पताल और जंड साहिब का 100 वर्ष पुराना प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी शामिल हैं, जहां तत्काल मरम्मत और पुनर्निर्माण की जरूरत बताई गई है। स्वास्थ्य योजनाओं पर भी सवाल रिपोर्ट में कहा गया कि मुख्यमंत्री सेहत बीमा योजना के तहत करीब 68 लाख परिवारों के कार्ड बनने के बावजूद कई निजी और सरकारी अस्पताल मरीजों को इलाज देने से मना कर रहे हैं। इसके अलावा डॉक्टरों द्वारा जेनरिक (सॉल्ट नेम) की जगह महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखे जाने से मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। समिति की प्रमुख सिफारिशें विधानसभा समिति ने अस्पतालों में ऑनलाइन पर्ची व्यवस्था, दवाओं में सॉल्ट नेम की अनिवार्यता की निगरानी और नशे के आदी लोगों को जेल भेजने के बजाय रिहैब सेंटर भेजने की नीति अपनाने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि नशे की समस्या को केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पुनर्वास के नजरिए से भी देखने की जरूरत है।
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