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2022 की हार के बाद कांग्रेस इस बार पंजाब में कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रही। हाईकमान ने न तो प्रदेश अध्यक्ष बदला और न ही किसी एक चेहरे पर पूरा दांव लगाया। अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को पद पर बरकरार रखते हुए चरणजीत सिंह चन्नी को इलेक्शन कैंपेन कमेटी (चुनाव प्रचार समिति) का चेयरपर्सन नियुक्त किया है। चन्नी को सुपर चेयरपर्सन बनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण पंजाब का सबसे मजबूत जातिगत समीकरण है, जहां करीब 31 फीसदी दलित (SC) वोट बैंक है। इसके साथ ही, कांग्रेस द्वारा जारी की गई इस नई सूची में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ से लेकर ‘रीजनल इक्वेशन’ को पूरी तरह से साधने के लिए एक सटीक फॉर्मूले को अपनाया गया है, जिसमें सबसे बड़े क्षेत्र ‘मालवा’ को चार सबसे प्रमुख पदों की कमान सौंपी गई है। 2022 विधानसभा चुनाव की हार का सबक
2022 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने जुलाई 2021 में सुनील जाखड़ को प्रधान पद से हटाकर जट सिख नेता नवजोत सिंह सिद्धू को प्रधान बनाया। कुछ समय बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर सितंबर में चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया। नवजोत सिंह सिद्धू ने इस फैसले से नाराज होकर प्रधान पद से इस्तीफा दिया हालांकि बाद में उन्हें मना लिया गया और उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया। चुनाव के दौरान सिद़्धू और चन्नी गुट अलग-अलग दिखे, जिसका खामियाजा पार्टी को हार के रूप में झेलना पड़ा। इस बार कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन करने से डर गई। कांग्रेस को डर था कि राजा वड़िंग को प्रधान से हटाया तो उनका गुट सिद्धू की तर्ज पर पार्टी के खिलाफ काम करता। इसलिए पार्टी हाईकमान ने उन्हें पद से हटाने की हिम्मत नहीं दिखाई। सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर किसको कहां क्या जिम्मेदारी दी गई… 1. दलित वोट बैंक पर सबसे बड़ा दांव: पंजाब में करीब 31% दलित वोट है। पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से दलित नेता अहम पदों पर नहीं थे। चन्नी इस मामले को खुलकर पार्टी फोरम में उठा चुके थे। इसके अलावा तरनतारन उपचुनाव में राजा वड़िंग के पूर्व गृहमंत्री बूटा सिंह पर दिए बयान से पार्टी बैकफुट पर आ गई थी। ऐसे में पार्टी ने 2027 के लिए जो रणनीति बनाई है उसमें दलित समुदाय से आने वाले चन्नी को सुपर बॉस बनाया है। इसके अलावा दलित समुदाय के अन्य नेताओं को नेताओं को अहम जिम्मेदारियां दी हैं। पार्टी ने चन्नी को कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनाकर स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी का पूरा चुनाव प्रचार एक कद्दावर दलित चेहरे के इर्द-गिर्द घूमेगा। यह कदम आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के दलित वोट बैंक में सीधी सेंधमारी के लिए है। डॉ. अमर सिंह भी दलित सिख समुदाय से आते हैं। लोकसभा सांसद और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डॉ. अमर सिंह को मेनिफेस्टो कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया गया है। इसके पीछे रणनीति यह है कि दलित समुदाय से जुड़े बुनियादी मुद्दों, छात्रवृत्तियों, और लोक-लुभावन वादों को घोषणापत्र में मुख्य और तकनीकी रूप से ठोस जगह दी जा सके। इसके अलावा सुखविंदर सिंह डैनी मजहबी सिख समुदाय से आते हैं। पार्टी ने इन्हें वर्किंग प्रेसिडेंट की जिम्मेदारी दी है। माझा और मालवा बेल्ट में मजहबी सिख समुदाय और दलित युवाओं को सीधे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे से जोड़ने के लिए यह नियुक्ति बेहद अहम मानी जा रही है। इसके अलावा हिंदू दलित नेता राजकुमार वेरका को भी वर्किंग प्रेसिडेंट बनाया है। 2. जट सिख समुदाय को मुख्य कमान: पंजाब में जट सिखों की वोट 19% के आसपास मानी जाती है और यही समुदाय पंजाब की सत्ता की धुरी रहता है। दलित सिख चेहरे चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव में अहम जिम्मेदारी दी है तो जट्ट सिख नेता व लुधियाना से सांसद अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रधान और प्रताप सिंह बाजवा को एलओपी के पद पर बरकरार रखा है। वहीं कांग्रेस में सबसे तेज तर्रार जट्ट सिख नेता व पूर्व डिप्टी सीएम सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी का चेयरमैन बनाया है। यह कमेटी टिकट वितरण, चुनाव के लिए रणनीति तैयार करने में अहम भूमिका निभाएगी। वहीं कई जट्ट सिख नेताओं को कमेटियों में को-चेयरपर्सन की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी ने सुखपाल सिंह खैहरा, राणा गुरजीत सिंह, परगट सिंह, कुलजीत सिंह नागरा, अंगद सिंह सैनी और सुखबिंदर सिंह सरकारिया विभिन्न कमेटियों में बतौर को-चेयरमैन फिट किया है। 3. शहरों में हिंदू चेहरों को कमान: कांग्रेस ने पंजाब के 38 प्रतिशत हिंदू वोट बैंक को साधने के लिए हिंदू नेताओं को भी अहम जिम्मेदारियां दी हैं। हिंदू वोट ज्यादातर शहरों में है, इसलिए पार्टी ने शहरी नेताओं को ही प्राथमिकता दी है। विजय इंदर सिंगला को इलेक्शन मैनेजमेंट एंड को-ऑर्डिनेशन कमेटी का चेयरमैन बनाया गया है। इसका सीधा मतलब है कि चुनाव का पूरा मैनेजमेंट, लॉजिस्टिक्स, चुनावी फंड और नेताओं के बीच तालमेल बिठाने की चाबी एक हिंदू नेता के हाथ में रहेगी। इसके अलावा अमृतसर के ओपी सोनी, लुधियाना के भारत भूषण आशु दोनों को को-चेयरमैन बनाया गया है। वहीं हिंदू दलित चेहरे राज कुमार को वेरका वर्किंग प्रेसिडेंट बनाया गया है। इसके जरिए जालंधर, अमृतसर और लुधियाना जैसे बड़े हिंदू-बहुल और व्यापारिक शहरी क्षेत्रों को पूरी तरह अपने पाले में रखने की कोशिश की गई है। 4. ओबीसी और अल्पसंख्यक संतुलन: पार्टी ने ओबीसी व अल्पसंख्यक समुदाय को भी इलेक्शन कमेटियों में जगह दी है। संगत सिंह गिलजियां जो कि पिछड़ा वर्ग से आते हैं और उन्हें वर्किंग प्रेसिडेंट का पद दिया गया है, ताकि ओबीसी वोट बैंक को प्रतिनिधित्व का अहसास कराया जा सके। रजिया सुल्ताना मुस्लिम यानि अल्पसंख्यक समुदाय से आती हैं और उन्हें अल्पसंख्यक चेहरे के तौर पर उन्हें इलेक्शन मैनेजमेंट कमेटी में को-चेयरपर्सन बनाया गया है, ताकि मुस्लिम अल्पसंख्यकों का झुकाव कांग्रेस की तरफ बना रहे। रिजनल इक्वेशन बैलेंसिंग फॉर्मूले पर किसको क्या जिम्मेदारी दी गई जानिए… 1. मालवा क्षेत्र (69 सीटें): पंजाब की सत्ता का रास्ता मालवा से ही तय होता है, क्योंकि यहां सबसे ज्यादा 69 सीटें हैं। जो पार्टी मालवा फतह करती है, चंडीगढ़ के सचिवालय पर उसी का कब्जा होता है। यही कारण है कि कांग्रेस ने मालवा को चार बड़े और मुख्य पद (चेयरमैनशिप) देकर ‘सत्ता की असली चाबी’ सौंपी है। मालवा में पिछली बार आम आदमी पार्टी ने एकतरफा क्लीन स्वीप किया था। इस बार कांग्रेस चन्नी के दलित कार्ड, सिंगला के हिंदू कार्ड और राजा वड़िंग के युवा जट सिख चेहरे के दम पर मालवा की 69 सीटों पर अपना परचम लहराना चाहती है। 2. माझा क्षेत्र (25 सीटें) : माझा क्षेत्र को हमेशा से कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन यहां शिरोमणि अकाली दल और पंथिक वोट बैंक का भी प्रभाव है। इस बेल्ट में विरोधियों को रोकने के लिए कांग्रेस ने आक्रामक नेताओं को आगे किया है। 3. दोआबा क्षेत्र (23 सीटें) : जालंधर, होशियारपुर और कपूरथला का यह क्षेत्र एनआरआई के प्रभाव और पंजाब में सबसे सघन दलित आबादी के लिए जाना जाता है। यहां संगठनात्मक मजबूती और चेहरों का सही मिश्रण जरूरी था। यहां से पार्टी ने अलग-अलग वर्ग के नेताओं को कमेटियों में जगह दी है। 117 सीटों के चक्रव्यूह को भेदने का मुकम्मल प्लान
कांग्रेस आलाकमान की इस नई चुनावी संरचना का अगर एक लाइन में विश्लेषण किया जाए, तो साफ है कि पार्टी ने मालवा को ‘सत्ता की चाबी’ (सभी बड़े चेयरमैन पद), माझा को ‘रणनीति व संगठन की कमान’ (कोर कमेटी और नेता प्रतिपक्ष), और दोआबा को ‘सांगठनिक संतुलन’ (वर्किंग प्रेसिडेंट व दलित-ओबीसी गठजोड़) सौंपकर 117 सीटों के चक्रव्यूह को भेदने की पूरी तैयारी कर ली है। चरणजीत सिंह चन्नी को फ्रंट सीट पर बिठाकर कांग्रेस ने यह भी साफ कर दिया है कि वह 2027 में किसी भी तरह की गुटबाजी से बचकर एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरेगी।
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पंजाब में 2022 की हार से डरी कांग्रेस:वड़िंग प्रधान बने रहेंगे, दलित नाराज न हों इसलिए चरणजीत चन्नी को कैंपेन कमेटी चेयरमैन बनाया







