पटियाला जिले में ग्राम पंचायत निधियों के कथित दुरुपयोग और श्मशान घाट परियोजना में वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक धन के गबन और फर्जी दस्तावेजों के जरिए भुगतान निकालने जैसे आरोपों की गंभीरता को देखते हुए आरोपी से हिरासत में पूछताछ जरूरी है। इसी आधार पर एक ठेकेदार की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई। पंजाब के पटियाला जिले में ग्राम पंचायत निधियों में कथित करोड़ों रुपये के गबन से जुड़े चर्चित मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने एक ठेकेदार को अग्रिम जमानत देने से इन्कार कर दिया है। अदालत ने कहा कि मामले में फर्जी बिल तैयार कर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के गंभीर आरोप हैं और सच्चाई सामने लाने के लिए आरोपी की हिरासत में पूछताछ अत्यंत आवश्यक है। यह आदेश जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह ने दिनेश कुमार बंसल की याचिका पर सुनाया। दिनेश कुमार बंसल ने विजिलेंस ब्यूरो थाना, पटियाला में दर्ज एफआईआर संख्या 37 दिनांक 23 जुलाई 2025 में गिरफ्तारी से पहले जमानत की मांग की थी। मामले की शुरुआत विजिलेंस जांच से हुई मामले की शुरुआत विजिलेंस ब्यूरो की जांच रिपोर्ट से हुई। जांच में सामने आया कि गांव नलास खुर्द के तत्कालीन सरपंच मुंशी राम और पंचायत सदस्यों के कार्यकाल के दौरान पंचायत खातों में लगभग 58.43 करोड़ रुपये उपलब्ध थे। इसके अतिरिक्त वर्ष 2019 से 2022 के बीच विभिन्न अनुदानों, ब्याज और अन्य स्रोतों से करीब 7.50 करोड़ रुपये और प्राप्त हुए। विजिलेंस जांच में आरोप लगा कि पंचायत ने विकास कार्यों पर 32.20 करोड़ रुपये खर्च दिखाए, लेकिन तकनीकी जांच के दौरान कई खर्चों में गंभीर अनियमितताएं मिलीं। जांच एजेंसियों ने पाया कि स्टेडियम निर्माण कार्य में ही करीब 3.61 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ। जांच का सबसे गंभीर हिस्सा गांव के श्मशानघाट में इलेक्ट्रिक फर्नेस और शेड लगाने की परियोजना से जुड़ा है। निरीक्षण के दौरान कोई फर्नेस स्थापित नहीं मिला विजिलेंस के अनुसार पंचायत ने इलेक्ट्रिक फर्नेस की खरीद और स्थापना के लिए कई फर्मों को भुगतान किया, जिनमें दिनेश कुमार बंसल की फर्म भी शामिल थी। हालांकि मौके पर निरीक्षण के दौरान कोई फर्नेस स्थापित नहीं मिला। जांच एजेंसी का आरोप है कि बिना फर्नेस लगाए ही भुगतान निकाल लिया गया, जिससे सार्वजनिक निधि को 43.32 लाख रुपये का नुकसान हुआ। ठेकेदार को साजिश का हिस्सा बताया याचिकाकर्ता ने दलील दी कि वह केवल एक ठेकेदार है और उसने अपने हिस्से का कार्य पूरी तरह निष्पादित किया था। हीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि आरोपी केवल ठेकेदार नहीं बल्कि कथित साजिश का सक्रिय हिस्सा था। आरोप है कि उसने सरपंच और अन्य पंचायत अधिकारियों के साथ मिलकर फर्जी बिल तैयार किए और सरकारी धन की हेराफेरी में भूमिका निभाई। राज्य ने अदालत को बताया कि यदि सामग्री वास्तव में खरीदी गई थी तो आरोपी को यह बताना होगा कि वह सामग्री कहां से खरीदी गई, किसे भुगतान किया गया और उसके दस्तावेज क्या हैं। स्थिति को देखते हुए याचिका खारिज हुई हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि फर्नेस अथवा संबंधित सामग्री वास्तव में किसी आपूर्तिकर्ता से खरीदी गई थी। अदालत ने कहा कि अग्रिम जमानत एक असाधारण राहत है, जिसे सामान्य मामलों में नहीं दिया जा सकता। विशेषकर जब आरोप सार्वजनिक धन के गबन, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और भ्रष्टाचार से जुड़े हों।
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