संगरूर में घर से भागकर लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा कपल सुरक्षा के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा है। उन्होंने परिजनों से जान से खतरा बताया है। इस याचिका पर हाईकोर्ट ने सुनवाई की। इस दौरान जज ने स्पष्ट किया कि वह इस रिश्ते की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे, लेकिन यदि दोनों की जान और स्वतंत्रता को खतरा है तो उनकी सुरक्षा करना पुलिस की जिम्मेदारी है। हाईकोर्ट ने संगरूर के SSP रवजोत ग्रेवाल को शिकायत पर सात दिन के भीतर फैसला लेने और खतरा पाए जाने पर सुरक्षा उपलब्ध कराने के आदेश दिए हैं। दोनों डेढ़ महीने पहले घर से भागे थे। तब से संगरूर में किराए के मकान में रह रहे हैं। लड़का संगरूर के एक कॉलेज में बीए की पढ़ाई कर रहा है। वहीं लड़की 12वीं पास है। मामले में लड़की नाबालिग और लड़का बालिग बताया गया है। अब सिलसिलेवार पूरा मामला पढ़िए… कपल ने 16 जून को हाईकोर्ट का रूख कया
कपल ने 16 जून को सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने याचिका में कहा कि वे लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं और उन्हें अपने परिवार व रिश्तेदारों से जान का खतरा है। सुरक्षा की मांग को लेकर उन्होंने पहले संगरूर SSP से भी संपर्क किया था। लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। परिवार दूसरी जगह शादी कराने का बना रहा दबाव
लड़की का कहना है कि उसने 12वीं कक्षा पास कर ली है। उसके अनुसार आधार कार्ड में उम्र गलत दर्ज है। परिवार दूसरी जगह पर शादी करने के लिए दबाव बना रहा है। शादी से मना करने पर परिवार की तरफ से लगातार धमकियां मिल रही हैं। पुलिस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। इसलिए उन्होंने अदालत का रुख किया है। हाईकोर्ट ने सुरक्षा को बताया प्राथमिकता
19 जून को मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह की पीठ ने कहा कि अदालत इस स्तर पर दस्तावेजों या लिव-इन रिश्ते की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि प्रत्येक नागरिक के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा संवैधानिक जिम्मेदारी है। ऐसे में यदि खतरे की आशंका है तो पुलिस को आवश्यक कदम उठाने होंगे। कानूनी कार्रवाई से नहीं मिलेगी छूट
अदालत ने साफ किया कि सुरक्षा देने का मतलब किसी भी कानूनी कार्रवाई से छूट नहीं है। यदि कानून का उल्लंघन पाया जाता है तो पुलिस और संबंधित एजेंसियां नियमानुसार कार्रवाई कर सकती हैं। इस आदेश का उद्देश्य केवल जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, न कि किसी को कानूनी संरक्षण प्रदान करना। 5 जून को हाईकोर्ट इसके उलट सुना चुका फैसला
5 जून को हाईकोर्ट ने एक अन्य कपल के सुरक्षा माांगने पर सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 सभी नागरिकों को गरिमा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। याचिकाकर्ता अपने माता-पिता का घर छोड़कर भागकर न केवल परिवार का नाम बदनाम कर रहे हैं, बल्कि गरिमा और सम्मान के साथ समाज में जीने के अपने माता-पिता के मौलिक अधिकार का भी सीधा उल्लंघन कर रहे हैं । कोर्ट ने टिप्पणी की कि भारत सिद्धांतों, परंपराओं और विश्वासों का देश है, जहां विवाह को एक पवित्र और महान सामाजिक प्रतिष्ठा वाला रिश्ता माना जाता है। देश की गहरी सांस्कृतिक जड़ें नैतिकता पर टिकी हैं। लेकिन समय बीतने के साथ समाज का एक हिस्सा आधुनिक जीवनशैली के नाम पर पश्चिमी संस्कृति (लिव-इन-रिलेशनशिप) को अपना रहा है, जो भारतीय संस्कृति से मेल नहीं खाती। अदालत ने कहा कि लिव-इन-रिलेशनशिप के लिए यह आवश्यक है कि जोड़ा समाज के सामने खुद को जीवनसाथी की तरह प्रस्तुत करे और दोनों शादी की कानूनी उम्र के साथ-साथ अविवाहित होने योग्य हों। कोर्ट ने कहा कि अगर महज कुछ दिनों के कोरे दावों पर बिना शर्तों के सुरक्षा दी जाने लगी, तो इससे समाज का पूरा सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो जाएगा ।
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दूसरी जगह शादी के दबाव पर बॉयफ्रेंड संग भागी नाबालिग:परिजनों से जान का खतरा बताया, हाईकोर्ट ने संगरूर SSP को दिया समय
