पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मातृत्व और बच्चे की परवरिश को लेकर एक संवेदनशील और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल गर्भवती होने के आधार पर किसी महिला को उसके पहले बच्चे की कस्टडी से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसे मां के साथ गंभीर मानसिक क्रूरता माना है। अमृतसर की एक महिला ने अपने 3 साल के बेटे की कस्टडी के लिए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। महिला का आरोप था कि उसके ससुराल वालों ने जबरन उसके बच्चे को अपने पास रख लिया है और उसे मिलने तक नहीं दे रहे। इस बीच वह दूसरी बार गर्भवती हो गई है। ससुराल पक्ष ने कोर्ट में तर्क दिया कि महिला गर्भवती है इसलिए वह पहले बच्चे की सही देखभाल नहीं कर पाएगी। हाईकोर्ट ने इस अजीबोगरीब दलील को सिरे से खारिज कर दिया। ससुराल वालों को तुरंत बच्चे को मां के पास भेजने के आदेश अमृतसर की एक महिला ने अपने 3 साल के बेटे की कस्टडी के लिए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। महिला का आरोप था कि उसके ससुराल वालों ने जबरन उसके बच्चे को अपने पास रख लिया है और उसे मिलने तक नहीं दे रहे। इस बीच वह दूसरी बार गर्भवती हो गई है। ससुराल पक्ष ने कोर्ट में तर्क दिया कि महिला गर्भवती है इसलिए वह पहले बच्चे की सही देखभाल नहीं कर पाएगी। हाईकोर्ट ने इस अजीबोगरीब दलील को सिरे से खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के मुताबिक, 5 साल से कम उम्र के बच्चों के मामले में मां ही प्राथमिक संरक्षक होती है। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि महिला बच्चे की परवरिश के लिए अयोग्य है। अदालत ने कहा कि कस्टडी के मामलों में बच्चे का हित सबसे महत्वपूर्ण होता है। एक गर्भवती मां से उसका बच्चा अलग करना न केवल मां को मानसिक पीड़ा देता है बल्कि बच्चे के विकास में भी बाधक है। हाईकोर्ट ने मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए ससुराल पक्ष को आदेश दिया है कि 3 वर्षीय बच्चे को तुरंत उसकी मां को सौंपा जाए। कोर्ट ने माना कि बच्चे का शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास अपनी मां के साथ रहने में ही सबसे बेहतर तरीके से होगा।
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गर्भवती होना बच्चे की कस्टडी छिनने का आधार नहीं, बच्चा मां के आंचल में ही सुरक्षित : हाईकोर्ट







