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राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने लोक सेवकों को दुर्भावनापूर्ण और बदले की भावना से दर्ज कराए जाने वाले मुकदमों से बचाने के लिए ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (‘BNSS’) के तहत एक अहम कानूनी व्यवस्था दी है। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने श्रीगंगानगर की विशेष अदालत के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसमें चार पुलिसकर्मियों (एक DSP समेत) के खिलाफ सीधे FIR दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने साफ कहा कि नए कानून BNSS की धारा 223 अब हर सरकारी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई से पहले दो जरूरी शर्तें लागू करती है: जब जांच उलटी पड़ी, तो पुलिस पर ही साधा निशाना इस पूरे मामले की जड़ दो पक्षों के बीच चल रही कानूनी खींचतान से शुरू हुई । अनूपगढ़ थाने में अगस्त 2025 में एक पक्ष ने टेकचंद के खिलाफ SC/ST एक्ट समेत गंभीर धाराओं में केस दर्ज कराया। पुलिस ने जांच की और अक्टूबर में चार्जशीट दाखिल कर दी। टेकचंद ने जवाब में सितंबर में क्रॉस-केस दर्ज कराया। लेकिन पुलिस की जांच से नाराज होकर उसने DGP विजिलेंस को शिकायत दी। जब वहां से भी मनमाफिक कार्रवाई नहीं हुई, तो उसने बिना अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किए 1 नवंबर 2025 को विशेष अदालत में उन्हीं चार पुलिसवालों के खिलाफ परिवाद दायर कर दिया DSP प्रशांत कौशिक, SI सरदार सिंह, ASI मनोहर सिंह और चालक किशन सिंह पर। 21 नवंबर को विशेष न्यायाधीश ने “यांत्रिक आदेश” जारी करते हुए श्रीगंगानगर पुलिस अधीक्षक को इन चारों के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दे दिया। इस आदेश के 4 दिन बाद 25 नवंबर को पुलिस ने क्रॉस-मुकदमे की जांच पूरी कर नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट पेश की और उसे दबाव बनाने के लिए दर्ज करवाया गया मामला बताया। हाईकोर्ट ने इस निचली अदालत के आदेश पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे एक ‘यांत्रिक आदेश’ करार दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि विशेष न्यायाधीश ने आदेश पारित करते समय नए कानून की धारा 175(4) की जरूरी आवश्यकताओं का पूरी तरह उल्लंघन किया। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने न तो क्रॉस-मुकदमों की पृष्ठभूमि देखी और न ही शिकायतकर्ता की प्रतिशोधात्मक मंशा पर विचार किया। लोक सेवकों के लिए ‘सुरक्षात्मक छलनी’ है धारा 223 जस्टिस फरजंद अली ने अपने रिपोर्टेबल फैसले में नए कानून की धारा 223 की विस्तृत व्याख्या की। कोर्ट ने इसे एक ‘सुरक्षात्मक छलनी’ बताते हुए कहा कि यह कानून सुनिश्चित करता है कि लोक सेवकों को उनके आधिकारिक कार्यों के कारण झूठे मुकदमों में न घसीटा जाए। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि मजिस्ट्रेट सीधे एफआईआर का आदेश नहीं दे सकते। उन्हें पहले एक ‘प्रारंभिक जांच’ करनी होगी, जिसमें दो शर्तें अनिवार्य हैं: पहली, संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का वास्तविक मौका देना और दूसरी, उनके उच्चाधिकारी से तथ्यात्मक रिपोर्ट प्राप्त करना। फैसला: आदेश रद्द, नए सिरे से सुनवाई के निर्देश हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के एफआईआर दर्ज करने वाले आदेश और उसके तहत की गई समस्त कार्रवाई को रद्द कर दिया है। मामले को वापस निचली अदालत को भेजते हुए निर्देश दिए हैं कि पहले प्रारंभिक जांच की जाए और सभी वैधानिक प्रक्रियाओं को पूरा किया जाए। इसके बाद ही मजिस्ट्रेट को एक ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ पारित करना होगा, जिसमें न्यायिक विवेक की स्पष्ट झलक हो।
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